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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 23, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

एक मिसाल है इनकी ज़िन्दगी, जानिये 'साहब' की दीवानी सायरा बानो का दिलचस्प सफ़र

By Hirendra JEdited By:
Published: Wed, 23 Aug 2017 09:46 AM (IST)Updated: Fri, 24 Aug 2018 09:45 AM (IST)

सायरा दिलो-जान से बुजुर्ग और अल्जाइमर की बीमारी से पीड़ित दिलीप साहब की तीमारदारी में लगी हैं और वही उनकी आवाज़ भी हैं और धड़कन भी।

एक मिसाल है इनकी ज़िन्दगी, जानिये 'साहब' की दीवानी सायरा बानो का दिलचस्प सफ़र
एक मिसाल है इनकी ज़िन्दगी, जानिये 'साहब' की दीवानी सायरा बानो का दिलचस्प सफ़र

मुंबई। 23 अगस्त 1944 को जन्मीं सायरा बानो अपने दौर की सबसे खूबसूरत एक्ट्रेस में से एक थीं। वो इतनी ख़ूबसूरत और मासूम दिखतीं कि लोग उनके अभिनय से ज्यादा उनकी ख़ूबसूरती के लिए उन्हें याद करते। गुज़रे ज़मानों की अभिनेत्रियों में से कुछ तो ऐसी हैं जिन्हें समय ने भुला दिया, कुछ ऐसी हैं जो अपने चाहने वालों की यादों में रची-बसी हैं तो कुछ ऐसी भी हैं जो एक पूरी पीढ़ी को लगातार इंस्पायर करती हैं, ऐसी ही एक अदाकारा का नाम है सायरा बानो।

इनदिनों अपने बीमार और बुजुर्ग पति और वेटरन एक्टर दिलीप कुमार की सेवा में लगीं सायरा अक्सर ये कहती सुनी गयी हैं कि -"मैं साहब की दीवानी हूं"। साहब यानी दिलीप कुमार। सायरा का अधिकतर बचपन लंदन में बीता जहां से पढ़ाई खत्म करके वह भारत लौट आईं। स्कूल से ही उन्हें अभिनय से लगाव था और स्कूल में भी उन्हें अभिनय के लिए कई पदक मिले थे। अभिनय के प्रति उनकी यही दीवानगी थी कि महज़ 17 साल की उम्र में ही उन्होंने बॉलीवुड में अपने करियर की शुरुआत कर दी।

अभिनय से उनके जुड़ाव की एक वजह यह भी रही कि उनकी मां नसीम बानो तीस के दशक की एक कामयाब अभिनेत्री थीं। परिवार की मर्जी को धता बताकर नसीम बानो बॉलीवुड में आई और अपनी पहचान बनाई। नसीम तीस के दशक की तमाम एक्ट्रेस में सबसे अधिक हसीन थीं इसीलिए उन्हें ब्यूटी-क्वीन भी कहा जाता था। 'बेगम','चांदनी रात' उनकी कुछ बेस्ट फ़िल्मों में से हैं। बहरहाल, एक इंटरव्यू में सायरा ने कहा भी था कि जब वो बारह साल की थी तब दो ही सपने थे एक तो यह कि वो अपनी मां के जैसी बनना चाहती थीं और दूसरी वो मिसेज़ दिलीप कुमार बनना चाहती थीं। 

सायरा की पहली फ़िल्म 1961 में आयी। फ़िल्म का नाम था 'जंगली' और उनके साथ थे शम्मी कपूर। यह फ़िल्म ज़बरदस्त हिट रही। इस फ़िल्म के लिए सायरा को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फ़िल्म ल्मफेयर अवार्ड के लिए भी नामांकित किया गया। उसके बाद तो जैसे सायरा के करियर की गाड़ी चल पड़ी। 'जंगली' के बाद सायरा की कई सुपरहिट फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाने लगी थी।

उन दिनों राजेन्द्र कुमार को जुबिली कुमार के नाम से पुकारा जाने लगा था। सायरा का दिल राजेन्द्र पर फिदा हो गया, जबकि वे तीन बच्चों वाले शादीशुदा व्यक्ति थे। मां नसीम को जब यह भनक लगी, तो उन्हें अपनी बेटी की नादानी पर बेहद गुस्सा आया। नसीम ने अपने पड़ोसी दिलीप कुमार की मदद ली और उनसे कहा कि सायरा को वे समझाएं कि वो राजेंद्र कुमार से अपना मोह भंग करे। दिलीप कुमार ने बड़े ही बेमन से यह काम किया क्योंकि वे सायरा के बारे में ज्यादा जानते भी नहीं थे और शादी का तो दूर-दूर तक इरादा नहीं था। जब दिलीप साहब ने सायरा को समझाया राजेन्द्र के साथ शादी का मतलब है पूरी ज़िन्दगी सौतन बनकर रहना और तकलीफें सहना। तब पलटकर सायरा ने दिलीप साहब से सवाल किया कि क्या वे उससे शादी करेंगे? दिलीप कुमार के पास तब इस सवाल का जवाब नहीं था। लेकिन, समय को कुछ और ही मंज़ूर था।

11 अक्टूबर 1966 को 25 साल की उम्र में सायरा ने 44 साल के दिलीप कुमार से शादी कर ली। कहते हैं कि दूल्हा बने दिलीप कुमार की घोड़ी की लगाम पृथ्वीराज कपूर ने थामी थी और दाएं-बाएं राज कपूर तथा देव आनंद नाच रहे थे। इस शादी के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। वाक़ई इन दोनों फिल्म स्टार्स की लाइफ फ़िल्मी ही थी। सायरा बानो शादी के बाद भी फ़िल्में करती रहीं।

साल 1968 में आयी फ़िल्म ‘पड़ोसन’ ने उन्हें दर्शकों के बीच बेहद पॉपुलर बना दिया। इस एक फ़िल्म ने उनके कॅरियर के लिए टर्निग-प्वॉइंट का काम किया। जिसके बाद उन्होंने ‘गोपी’, ‘सगीना’, ‘बैराग’ जैसी हिट फ़िल्मों में दिलीप कुमार के साथ काम किया। ‘शागिर्द’, ‘दीवाना’, ‘चैताली’ जैसी फ़िल्मों में सायरा बानो ने दमदार अभिनय किया। सब कुछ सही जा रहा था। सायरा उनदिनों फ़िल्म 'विक्टोरिया 203' की शूटिंग कर रहीं थीं। उस समय वे गर्भवती थीं। लगातार शूटिंग करते रहने का असर यह हुआ कि उन्होंने एक मृत शिशु को जन्म दिया। इस दुर्घटना पर दिलीप कुमार फूट-फूटकर रोए थे। अपनी आत्मकथा में दिलीप कुमार साहब ने इस बारे में विस्तार से बताया है।

दिलीप-सायरा के बीच एक तूफ़ान तब आया जब उनके बीच अस्मां नामक एक महिला आकर खड़ी हो गई। कहा जाता है कि यह सब एक साजिश के तहत रचा गया प्लान था। 30 मई 1980 को उसने बंगलौर में दिलीप कुमार से शादी की। समय रहते दिलीप साहब ने उससे छुटकारा पा लिया। लेकिन, तीन साल तक वे झूठ बोलते रहे कि उनकी कोई दूसरी शादी नहीं हुई है। ऐसा माना जाता है कि दिलीप साहब के दिल में पिता कहलाने की एक ललक थी, जिसे वे शायद अस्मां के जरिये पूरी करना चाहते थे। अस्मां से अलग होने के बाद दिलीप कुमार और सायरा फिर से साथ थे, आज भी साथ हैं। इस बीच सायरा बानो की आखिरी फ़िल्म भी आयी “फैसला” जो साल 1988 में प्रदर्शित हुई।

दिलीप कुमार और सायरा बानो की ज़िन्दगी एक मिसाल है। आज भी सायरा दिलो-जान से बुजुर्ग और अल्जाइमर की बीमारी से पीड़ित दिलीप साहब की तीमारदारी में लगी हैं और वही उनकी आवाज़ भी हैं और धड़कन भी।

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