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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 14, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

जिंदगी थी पर आजादी नहीं थी

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Updated: Thu, 14 Aug 2014 08:46 AM (IST)

वो शासन नहीं कुशासन था। किसी को खुलकर बात करने की इजाजत नहीं थी। ऐसा भी क्या जीना, जिसमें आदमी की आजादी ही छिन जाए। हां आजकल की तरह अपराध नहीं था, लेक ...और पढ़ें

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दक्षिणी दिल्ली, [संजीव कुमार मिश्र]। वो शासन नहीं कुशासन था। किसी को खुलकर बात करने की इजाजत नहीं थी। ऐसा भी क्या जीना, जिसमें आदमी की आजादी ही छिन जाए। हां आजकल की तरह अपराध नहीं था, लेकिन परतंत्रता तो परतंत्रता होती है। अंग्रेजों की क्रूरता के किस्से तब गांव की गलियों में गूंजते थे। लोग छिपकर एक दूसरे से अंग्रेजों के बारे में बातें करते थे। खेतों में काम करते समय अंग्रेजों से लोहा लेने की योजनाएं बनती थी। ये सब बताते हुए चौधरी दयाचंद (90) के चेहरे की रौनक देखते ही बनती थी। वह कहते हैं जब जवान था तो अंग्रेज सरकार के आदेश की परवाह नहीं करता था। सरकार चाहे जो भी कहे, लेकिन गांव वाले तो अपनी धुन में रहते थे।

दयानंद बताते हैं कि उनके चार भाई थे। गांव में स्कूल नहीं होने से शिक्षा से वंचित रह गए, लेकिन गांव में लोग हमें बुद्धिमान कहते थे। आजादी के पहले के दिनों को याद करते हुए वह कहते हैं कि अंग्रेजों का घोड़ा जिधर से गुजरता था, उधर पूरा रास्ता खाली हो जाता था। लोग उस रास्ते से गुजरते भी नहीं थे। अंग्रेज अफसर कभी आंदोलनकारी तो कभी हथियार छिपाने के नाम पर घर की तलाशी लेते थे, लेकिन हम भी कहां डरने वाले थे। कई बार गांव के लोगों ने विरोध भी जताया था।

गांधी जी का गांव में काफी प्रभाव था

गांधी जी का प्रभाव गांव में काफी था। उनके द्वारा विदेशी वस्तुओं की होली जलाने एवं स्वदेशी सामान का प्रयोग करने के आह्वान के बाद तो जैसे गांव में क्रांति ही आ गई थी। पहले से ही खेती किसानी कर रहे गांव के लोग चरखा प्रयोग करने लगे और गांव में ही खादी वस्त्र बनाए जाने लगे।

बंटवारे ने देश को तोड़ कर रख दिया

दयानंद कहते हैं कि आजादी से पहले बंटवारे ने देश को तोड़ कर रख दिया। कई जानने वाले मुसलमानों को बंटवारे के कारण पाकिस्तान जाना पड़ा। वह वक्त बड़ा बेरहम था। लोग एक दूसरे को मरने-मारने पर उतारू थे। इंसान की कौम पूछी जाती थी। रेडियो पर सिर्फ दंगों की खबर आती थी। लेकिन आजादी मिली तो लगा मानों वर्षो पुरानी मुराद पूरी हो गई। 15 अगस्त को गांव में दिन भर ढोल-नगाड़े बजे। लोगों ने जमकर जश्न मनाया। लेकिन समय के साथ-साथ काफी कुछ बदल गया। अब लोग न तो एक दूसरे को इज्जत देते हैं न ही एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव हैं। गंदी राजनीति ने देश को विनाश के मुहाने लाकर खड़ा कर दिया। आजादी के चार साल बाद गांव में एक प्राइमरी स्कूल खुला था, लेकिन उसके बाद से अब तक कोई और प्राइमरी स्कूल भी नहीं खुला।

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