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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 13, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

नेहरू ने सुनी होती केनेडी की बात तो कुछ और होता इतिहास

By Sanjeev TiwariEdited By:
Updated: Mon, 13 Jun 2016 11:13 PM (IST)

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी का मानना था कि परमाणु परीक्षण करने वाला पहला एशियाई देश लोकतांत्रिक भारत हो, न कि कम्यूनिस्ट चीन।

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नई दिल्ली, प्रेट्र । देश के पूर्व विदेश सचिव महाराजकृष्ण रसगोत्र ने कहा है कि भारत को एनएसजी में शामिल होने के लिए इतना संघर्ष न करना पड़ता अगर पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी के परमाणु परीक्षण में मदद की पेशकश न ठुकराई होती।

ऑब्जर्व रीसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) के कार्यक्रम में सोमवार को रसगोत्र ने अपनी नई किताब 'ए लाइफ इन डिप्लोमेसी' के विमोचन पर कहा कि चीन के 1964 में परमाणु परीक्षण करने से पहले ही अगर नेहरू ने यह कदम उठा लिया होता तो भारत चीन से पहले ही, न सिर्फ एशिया में पहली परमाणु शक्ति बनता बल्कि चीन को 1962 का युद्ध थोपने से भी रोक सकता था। इतना ही नहीं भारत तब 1965 में युद्ध से पहले ही पाकिस्तान के फील्ड मार्शल अयूब खान की साजिश को कुचल देता। केनेडी भारतीय लोकतंत्र के प्रशंसक थे। वह जवाहर लाल नेहरू का भी बतौर प्रधानमंत्री बहुत सम्मान करते थे। उनका मानना था कि परमाणु परीक्षण करने वाला पहला एशियाई देश लोकतांत्रिक भारत हो, न कि कम्यूनिस्ट चीन।

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केनेडी ने तब अपने हाथ से लिखा पत्र अमेरिका के परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष को सौंपा गया था। ताकि वह राजस्थान के रेगिस्तान में भारतीय परमाणु वैज्ञानिकों की इस दिशा में अपने संगठन की ओर से मदद कर सकें। उस पत्र में केनेडी ने लिखा था कि वह और उनका अमेरिकी संगठन नेहरू के परमाणु परीक्षण और परमाणु हथियार के खिलाफ होने से वाकिफ है। लेकिन उनका आग्रह था कि चीन के परीक्षण से नेहरू सरकार के लिए राजनीतिक दबाव और सुरक्षा पर खतरा बन जाएगा। पत्र के आखिर में उन्होंने जोर देकर कहा कि देश की सुरक्षा से ज्यादा जरूरी कुछ भी नहीं है।

उन्होंने कहा कि अगर भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने केनेडी के मदद के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया होता। अगर भारत ने चीन के 1964 के परमाणु परीक्षण से पहले खुद ही परमाणु परीक्षण किया होता तो परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में शामिल होने के लिए आज भारत को ऐड़ी-चोटी का जोर न लगाना पड़ता।

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