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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 07, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

आधुनिकता में खो रही संस्कृत की 'पहचान'

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Updated: Sat, 07 Jun 2014 12:04 PM (IST)

हमारी संस्कृति, जुबान और पहचान रही संस्कृत भाषा आज अपने वजूद के लिए संघर्षरत है। शिक्षा के आधुनीकरण के इस दौरान में लगातार उपेक्षित हो रही संस्कृत का ...और पढ़ें

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बरेली, [वली मोहम्मद]। हमारी संस्कृति, जुबान और पहचान रही संस्कृत भाषा आज अपने वजूद के लिए संघर्षरत है। शिक्षा के आधुनीकी करण के इस दौरान में लगातार उपेक्षित हो रही संस्कृत का दायरा अब सिर्फ किताबों तक सिमट कर रह गया है। संस्कृत भाषा, भावनाएं संस्कृत के श्लोकों से एक दूसरों तक पहुंचती थीं। वाल्मीकि की रामायण हो या फिर महर्षि व्यास की गीता, संस्कृत के शब्दों ने आज भी उन दृश्यों को सजीव रखा है। वेद-पुराणों में ब्रह्मांड की सारी जानकारी कूट-कूट कर भरी है, लेकिन हम उस जानकारी से दूर होते जा रहे हैं।

कभी संस्कृत में संवाद होता था, लेकिन आज संस्कृत किताबों में ही दम तोड़ रही है। अंग्रेजी की घुसपैठ ने जिस तरह से हिंदी के वजूद को खतरे में डाला है। वहीं संस्कृत भाषा पाठ्यक्रमों से ही गायब होती जा रही है। आधुनिकता की दौड़ में भारतीय संस्कृति की पहचान पश्चिमी चकाचौंध में खोती जा रही है।

नहीं सुनाई देते श्लोक

बात चाहें बेसिक स्कूलों की करें या फिर महाविद्यालयों की लेकिन हर जगह संस्कृत भाषा का वजूद खतरे में है। बेसिक स्कूलों में संस्कृत पढ़ाने के लिए कोई विशेष शिक्षक नहीं रखा जाता और नहीं ढंग से कक्षाएं चलती हैं। बस नाम के लिए सरकार छात्रों को मुफ्त किताबें दे देती है लेकिन वो कभी बच्चों के बस्तों के बाहर नहीं आ पाती। ककहरा के बीच संस्कृत श्लोक की गूंज नहीं गूंजती। वहीं महाविद्यालयों कोर्स तो संचालित होते हैं लेकिन पढ़ने और पढ़ाने वालों की संख्या बेहद कम रहती है। रुहेलखंड विश्वविद्यालय जैसी जगह में न तो हिंदी का वजूद और न ही संस्कृत का।

बरेली का हाल: बीए- 300 छात्र ,एमए - 430 छात्र , शिक्षक -तीन

बरेली कॉलेज के अलावा बरेली में साहू राम स्वरूप में ही संस्कृत पढ़ाई जाती है। वहीं मंडल में मुरादाबाद और शाहजहांपुर के एक महिला कॉलेज में संस्कृत पढ़ाई जाती है लेकिन यहां कक्षाएं केवल कागजों पर ही चलती हैं।

आधुनिकता से जोड़ी जाए संस्कृत

संस्कृत भाषा को आज संरक्षण की जरूरत है। उसको आधुनिक बनाने की पहल शासन स्तर से होनी चाहिए। राम गंगा ब्रिज स्थित श्रीमती जय देवी संस्कृत महाविद्यालय के प्रधानाचार्य और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित डॉ. नारायण दस शर्मा ने भाषा की उपेक्षा किए जाने पर खेद प्रकट किया। उनका कहना है कि सरकार की उदासीनता संस्कृत भाषा के वजूद को खत्म कर रही है। उनका कहना है कि संस्कृत को आधुनिक युग में जिंदा रखने के लिए उससे कंप्यूटर से जोड़ा जाना चाहिए। साथ ही सभी कक्षाओं के लिए प्रभावी संस्कृत का पाठ्यक्रम बनाया जाना चाहिए।

शिक्षक नहीं पढ़ाए कौन

माध्यमिक शिक्षा के सहायता प्राप्त और राजकीय कॉलेजों की बात की जाए तो संख्या साढ़े तीन सौ से ऊपर है लेकिन साठ प्रतिशत स्कूलों में संस्कृत पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं है। हिंदी के शिक्षक पढ़ाते हैं। यही हाल बेसिक स्कूलों का है।