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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 09, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

हौसलों को पंख देने की कोशिश

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Updated: Sat, 09 Aug 2014 10:07 AM (IST)

किसी चीज को पाने का जज्बा और जुनून हो तो इंसान लाख कमियों के बावजूद उसे पा लेता है। हौसला हर घड़ी इंसान को अपनी पहुंच से ऊपर तक मेहनत करने को प्रोत्साहित करता है। कुछ यही सोच डॉ. रविंद्र विधूड़ी [39] के दिलोदिमाग में है।

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नई दिल्ली, [अमित कसाना]। किसी चीज को पाने का जज्बा और जुनून हो तो इंसान लाख कमियों के बावजूद उसे पा लेता है। हौसला हर घड़ी इंसान को अपनी पहुंच से ऊपर तक मेहनत करने को प्रोत्साहित करता है। कुछ यही सोच डॉ. रविंद्र विधूड़ी [39] के दिलोदिमाग में है।

16 नेत्रहीन लोगों का उठा रहे जिम्मा

बिहारी कॉलोनी निवासी रविंद्र ने वर्तमान में 16 ऐसे लोगों के जीवनयापन का जिम्मा उठा रखा है, जो नेत्रहीन हैं। इन लोगों की पढ़ाई, रहने, खाने, आदि हर छोटी-बड़ी जरूरत को वह पूरा करते हैं। डॉ. रविंद्र बताते हैं कि पिछले 9 साल में वह करीब 49 बच्चों का पढ़ाई का खर्च उठा चुके हैं। वह जरूरतमंद बच्चों के लिए ऐसा स्कूल बनाना चाहते हैं, जहां उन्हें प्राइमरी शिक्षा नि:शुल्क दे सकें।

बढ़ता है आत्मविश्वास

डॉ. रविंद्र नंदनगरी में रहने वाले 16 नेत्रहीन लोगों (उम्र 18-30) से सप्ताह में एक बार जरूर मिलने जाते हैं। इनमें कुछ बीए व एमए की पढ़ाई कर रहे हैं और कुछ नौकरी की तलाश में हैं। वह कहते हैं कि नेत्रहीन लोगों की मदद करने पर उन्हें आत्मसंतुष्टि मिलती है।

भगत सिंह की जीवनी ने झकझोरा

अतीत की यादों में झांकते हुए वह बताते हैं कि करीब 10 साल पहले एक दिन मार्केट से भगत सिंह पर लिखी एक किताब लेकर आए। उनके जीवन से वह काफी प्रभावित हुए। कम उम्र में देश के लिए जान न्यौछावर करने की घटना ने उनके मन को झकझोर दिया। इसके बाद उन्होंने ठान लिया कि वह समाज सेवा कर जीवन व्यतीत करेंगे। वेटनरी का कोर्स करने के बाद उन्होंने प्रैक्टिस तो शुरू की, लेकिन मन की शांति नहीं मिली। क्लीनिक खोलने के बजाय वह रास्ते में पड़े जानवरों का इलाज करते। रविंद्र बताते हैं कि मां ने उन्हें हमेशा जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने इंटीरियर डेकोरेशन का कोर्स किया, जिससे समाज सेवा के लिए पैसों की कमी न हो। शुरू में उन्होंने घर के आसपास जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। इसके बाद उन बच्चों को चिह्नित किया, जिनकी पढ़ने में रुचि थी। ऐसे बच्चों का पांच से दस का ग्रुप बनाकर उन्हें पढ़ाने लगे। उनकी फीस, ड्रेस कॉपी-किताब आदि का खर्चा खुद वहन करते।

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