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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 10, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

आप की ऐतिहासिक जीत में चौंकाने वाला मोड़

By Gunateet OjhaEdited By:
Published: Tue, 10 Feb 2015 06:49 PM (IST)Updated: Tue, 10 Feb 2015 07:28 PM (IST)

आम आदमी पार्टी के नेता और पूर्व पत्रकार आशुतोष ने आप की अपार जीत को ऐतिहासिक मानते हुए कहा कि ...और पढ़ें

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नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के नेता और पूर्व पत्रकार आशुतोष ने आप की अपार जीत को ऐतिहासिक मानते हुए कहा कि इतिहास ने एक चौंकाने वाला मोड़ लिया है। एक असंभव जीत हासिल हो गई है। अजेय समझे जाने वाला आभामंडल चूर हो गया है।

आशुतोष ने कहा कि अगर ये बात कुछ महीने पहले आंकी गई होती तो लोग हम पर हंसे होते और हमें बेवकूफ करार दिया गया होता। उन्होंने कहा, मुझे अब भी याद है कि लोकसभा चुनाव के कुछ ही हफ्तों बाद अरविंद केजरीवाल के विधानसभा क्षेत्र के लोगों ने उनके ही मुंह पर अपने दरवाजे बंद कर दिए थे। एक बार केजरीवाल ने बताया था कि एक गार्ड के पास से गुजरने पर उसने उन पर पीएम बनने की महत्वाकांक्षी की फब्ती कसी थी। उसका ये बयान अरविंद के वाराणसी जाकर उनके प्रिय नेता मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने को लेकर था।

आशुतोष ने पार्टी के पिछले अनुभवों को साझा कर कहा कि पिछले साल लोकसभा चुनाव में जो हुआ वह एक नेता और एक पार्टी के लिए सबसे बुरा अनुभव था। आप ने दिल्ली में सभी सातों लोकसभा सीटों पर शिकस्त पाई थी। पूरे देश में 400 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 90 फीसद सीटों पर जमानत जब्त थी। तब पार्टी पर जमानत जब्त पार्टी का फिकरा कसा जाने लगा था। अरविंद केजरीवाल का बुरा हाल हुआ था। चूंकि उनकी पार्टी का दिल्ली में सिर्फ 4 फीसद वोटिंग प्रतिशत रह गया था और पंजाब में मात्र चार सीटें जीती थीं। हम सभी रसातल में थे।

पूर्व पत्रकार आशुतोष पार्टी में जनवरी 2014 में शामिल हुए। पिछले साल अपने पहले लोकसभा चुनाव में वह चांदनी चौक से पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे थे।

आशुतोष ने बताया कि उन्हें पता था कि दिल्ली में चुनाव लंबित हैं और उनकी घोषणा कभी भी हो सकती है। लिहाजा, पिछली हार की किरकिरी भुलाकर हम सब फिर एकजुट हुए और ये जानते हुए भी कि हम इस लड़ाई में बुरी तरह हारें हैं हमने खुद को यकीन दिलाया कि अभी लड़ाई जारी है। आप नेता ने बताया कि उन्होंने उस समय पहली बार केजरीवाल को घबराते और सशंकित देखा था। वह वैसे नहीं लग रहे थे जैसे वह हमेशा से थे। लेकिन सेना के एक जनरल की तरह उन्होंने साहस जुटाया और धीरे-धीरे जिंदगी की दुश्वारियों का जमकर मुकाबला करने का फैसला लिया। हमारे लिए ये बस करो या मरो की स्थिति थी। हमारे पास सिर्फ जीत ही विकल्प था। इसके लिए एक योजना बनाई। अपनी खामियों को पहचाना और उनमें से तीन प्रमुख को चिन्हित किया।

1.) हमें अहसास हुआ कि दिल्ली के लिए हमसे नाराज हैं। उन्हें लगा उनके साथ धोखा हुआ है। इस गलती को सुधारने के लिए केजरीवाल ने लोगों को भरोसा दिलाया कि वह दोबारा इस्तीफा नहीं देंगे। उन्होंने दिल्ली की जनता से माफी मांगी।

2.) आप पर बतौर पार्टी धरने बाज का ठप्पा लग गया था। इसलिए लोगों को यकीन दिलाया कि अब त्वरित योजना के बजाय योजनाओं का खाका तैयार किया। एक दिन के घोषणापत्र को छोड़ पार्टी ने खुद को सुशासन के लायक साबित किया। आम आदमी के हिसाब से दिल्ली के विकास की योजना बनाई। प्रचार अभियान को सकारात्मक रखा।

3.) तीसरी कमी ये थी कि पिछले विधानसभा चुनाव में हमारे कार्यकर्ता सशक्त थे लेकिन उन्हें संगठनात्मक ढांचे में ढाला नहीं गया था। इसलिए कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर तैयार किया गया। जब तक चुनाव की तारीख घोषित हुई केजरीवाल हर विधानसभा क्षेत्र के दो दौरे कर चुके थे। इन तीनों खामियों को दूर करने के साथ ही दिसंबर मध्य में पार्टी का खोया विश्वास वापस लौट आया। और आप के लिए ये चुनाव गेम चेंजर बन गया।

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