मातम के बीच मानवता की मिसाल: परपोतियों ने फोन पर दादा को मनाया, परदादी का नेत्रदान करा बनीं मिसाल
फारबिसगंज के परिहार परिवार ने अपनी परदादी सीता देवी के निधन के बाद नेत्रदान कर समाज के लिए एक अनूठी ...और पढ़ें

नेत्रदान के प्रमाण पत्र के साथ अररिया के दीपक परिहार, साथ में पत्नी और दोनों पुत्री। सौजन्य : स्वजन
HighLights
फारबिसगंज के परिहार परिवार ने परदादी का नेत्रदान किया।
परपोतियों ने दादा को चलती ट्रेन में राजी किया।
छह घंटे के भीतर नेत्रदान प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हुई।
रूपेश कुमार, अररिया। अपनों को हमेशा के लिए खोने के बाद अक्सर परिवार आंसुओं और मातम में डूब जाता है, लेकिन बिहार के अररिया जिले के फारबिसगंज निवासी परिहार परिवार ने ऐसा साहसिक कदम उठाया, जो समाज के लिए प्रेरणादायी बन गया है। शोक के क्षण में इस परिवार के बच्चों ने अपनी परदादी का नेत्रदान कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी।
पुस्तकालय रोड (वार्ड-छह) निवासी प्रकाश परिहार की माता सीता देवी का 26 फरवरी 2025 की दोपहर निधन हो गया। उस समय प्रकाश राजस्थान में थे।
शोक-संतप्त माहौल के बीच 'दधीचि देहदान समिति' के जिलाध्यक्ष आजातशत्रु अग्रवाल, सचिव पूनम पंडिया और सह-सचिव पप्पू लड्डा घर पहुंचे और मृतका के पौत्र दीपक परिहार (टोनी) को नेत्रदान के लिए प्रेरित किया। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मृत्यु के छह घंटे के भीतर कार्निया दान होना जरूरी था।
दीपक और उनकी पत्नी अनुराधा ने आत्ममंथन के बाद हामी तो भर दी, लेकिन मृतका के पुत्र (प्रकाश परिहार) की सहमति के बिना यह संभव नहीं था। उनके फारबिसगंज पहुंचने तक नेत्रदान का समय निकल जाता। ऐसे में परपोती ताशु और वंशिका ने यह अहम जिम्मेदारी उठाई।
नेटवर्क की भारी समस्या के बीच जैसे ही ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी, बच्चियों ने दादा से फोन पर संपर्क किया। बच्चियों ने उन्हें पूरी संवेदनशीलता से समझाया कि आंसुओं के बजाय नेत्रदान ही परदादी के लिए सबसे सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
बच्चियों की इस समझदारी और मार्मिक अपील ने दादा का दिल जीत लिया और उन्होंने दूर से ही अपनी सहमति दे दी। सहमति मिलते ही कटिहार मेडिकल कॉलेज की टीम पहुंची और रात करीब नौ बजे नेत्रदान की यह चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया पूरी कर ली गई।
दीपक और उनके परिवार ने बताया कि स्वजन की मृत्यु के तुरंत बाद यह फैसला लेना दिल को झकझोर देने वाला था, लेकिन जब यह अहसास हुआ कि उनकी दादी की आंखें अब किसी दृष्टिहीन के जरिए इस दुनिया को देखेंगी, तो मन के खालीपन को शांति व संबल मिल गया।
मृत्यु के उस सबसे कठिन क्षण में लिया गया उनका यह एक निर्णय, आज किसी के जीवन भर की रोशनी बन चुका है।
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