भारत में रक्षाबंधन, नेपाल में 'जनै पूर्णिमा': जानिए पड़ोसी देश में कैसे मनाते हैं भाई-बहन का यह त्योहार?
भारत और नेपाल के बीच रक्षाबंधन का त्योहार साझा संस्कृति, पारिवारिक रिश्तों और आत्मीयता का अनूठा संगम है। यह पर्व ...और पढ़ें

भारत में रक्षाबंधन, नेपाल में 'जनै पूर्णिमा' (AI Generated Image)
HighLights
भारत-नेपाल रक्षाबंधन साझा संस्कृति, पारिवारिक रिश्तों का संगम।
नेपाली बहनें भारतीय भाइयों को राखी बांधती, मजबूत होते संबंध।
खुली सीमा 'रोटी-बेटी' के संबंधों को और प्रगाढ़ बनाती।
दीपक कुमार गुप्ता, सिकटी (अररिया)। सीमाएं दो देशों को बांटती हैं, लेकिन इन देशों में रहने वाले लोग भावनात्मक रिश्तों से जुड़े होने के कारण इन सरहदों को नहीं मानते। इन्हीं सरहदों में एक नाम भारत और नेपाल का है। भारत और नेपाल के बीच रक्षाबंधन का त्योहार दोनों देशों की साझा संस्कृति, पारिवारिक रिश्तों और आत्मीयता का अनूठा संगम है।
आजादी के बाद से ही रक्षाबंधन के मौके पर भाई-बहन सीमा पार कर हर साल भारत व नेपाल आते-जाते रहे हैं। भाई-बहन के अटूट प्रेम का पर्व रक्षाबंधन उनके मिलन से पूरा होता है। हजारों भाइयों की कलाइयां बहनों की राखी से गुलजार होती हैं।
नेपाली बहनें भारतीय भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर यह कामना करती हैं कि यह राखी उनके भैया को सारे संकटों से बचाए। भाई भी अपनी बहन से रक्षा धागा बंधवाते समय यह वचन लेता है कि वह सदा अपनी बहन की रक्षा करेगा।
भारत व नेपाल के बीच शुरू से ही रोटी-बेटी का संबंध रहा है। रक्षाबंधन जैसे पर्व से दोनों देशों की संस्कृति व संबंधों को मजबूती मिलती रही है।
सीमावर्ती क्षेत्र के अररिया, फारबिसगंज, जोगबनी, सिकटी, कुर्साकांटा, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, बसमतिया, फुलकाहा, घूरना, पलासी सहित कई शहरों की बेटियों की शादी नेपाल में हुई है। ठीक उसी प्रकार, वहां की बेटियों से भी यहां के घर-आंगन गुलजार हैं।
पवित्र धागे का महत्व
विराटनगर की समाजसेविका गीता कार्की, बरुन थापा और करुणेश वात्सल कहते हैं कि भारत में जहां इसे रक्षाबंधन कहा जाता है, वहीं नेपाल में इसे मुख्य रूप से 'जनै पूर्णिमा' या 'ऋषि तर्पणी' के रूप में मनाया जाता है, जो कि श्रावण पूर्णिमा के दिन ही पड़ता है।
नेपाल में इस दिन पुरुष अपना पवित्र यज्ञोपवीत (जनै) बदलते हैं और पुरोहित तथा परिवार के लोग कलाई पर रक्षा सूत्र बांधते हैं, जो भारत की रक्षाबंधन की परंपरा से काफी मिलता-जुलता है। भारत और नेपाल (विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों और मिथिला क्षेत्र) के बीच सदियों से पारिवारिक और वैवाहिक संबंध रहे हैं।
इस त्योहार पर दोनों देशों के लोग एक-दूसरे के घर आते-जाते हैं, जिससे यह सांस्कृतिक मिलन और अधिक प्रगाढ़ होता है। भारत-नेपाल की खुली सरहद पर दोनों देशों के नागरिक, बहनें और सुरक्षा बल (जैसे एसएसबी और नेपाली प्रहरी) आपसी भाईचारे के साथ यह पर्व मनाते हैं।

एक जैसी जीवन पद्धति, एक ही धर्म
राजविराज (नेपाल) के पंडित संतोष भंडारी और सुरेश झा ने कहा कि इस पुरातन रिश्ते को आज भी दोनों देश निभाते हैं। आज भी नेपाल में वर्ष, मास आदि की आधिकारिक गणना सौर मान के भारतीय ज्योतिष शास्त्र में वर्णित शक एवं विक्रम संवत के अनुसार होती है।
नेपाल की जीवन पद्धति में समाहित सनातन धर्म के अनुपालन व पथ प्रदर्शक वेद-वेदांग सहित सभी प्राचीन एवं आधुनिक विद्याएं भारतीय ही हैं। कारण यह है कि वहां शास्त्र रूप में भारतीय मनीषा के परमतत्व वेद और व्याकरण ही पढ़ाए जाते हैं।
यही नहीं, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, नवरात्र हो या होली-दशहरा, दीवाली व रक्षाबंधन समेत श्रावणी उपाकर्म आदि पर्व भारतीय परंपरा एवं धर्मशास्त्रीय आधार पर ही नेपाल में भी मनाए जाते हैं। कर्मकांड सहित व्रत, पर्व, उत्सव-संस्कार आदि की समग्र विधियां भारत एवं नेपाल में एक जैसी ही हैं।
धार्मिक कार्यों के अंतर्गत होने वाले संकल्प में भारत की तरह ही नेपाल में भी अपने स्थान का वर्णन करते हुए 'जंबूद्वीपे भरतखंडे आर्यावर्तैक नेपाल देशे' का ही संकल्प होता है, जो नेपाल के भारत के साथ अविभाज्य संबंधों को प्रतिपादित करता है।

नेपाल में बसी बहनें
नेपाल के सप्तरी जिले में अवस्थित राजविराज शहर में बसी बहनें सुमन गुप्ता व पूनम रानी कहती हैं कि रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम की निशानी है। साल भर बहनों को इस पर्व का इंतजार रहता है और यही तड़प भाई के सीने में भी उठती रहती है।
बहनें भाई की कलाई पर रक्षा धागा बांधकर उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं, ताकि भाई अपनी बहनों की रक्षा कर सकें।
वे बताती हैं कि शादी के करीब बीस बसंत बीत गए, लेकिन सीमा पार कर भारत के कुर्साकांटा प्रखंड जाकर अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधना वे कभी नहीं भूलतीं। वे नेपाल और भारत सरकार की शुक्रगुज़ार हैं कि खुली नेपाल सीमा भाइयों से मिलन में कभी अवरोधक नहीं बनी।
