पान खाये सैंया हमार: गीत वही रहा; स्वाद फीका पड़ा, बिहार में पान हो गया 5 गुना महंगा
अररिया में पान के पत्तों की कीमत में चार से पांच गुना बढ़ोतरी हुई है, जिससे इसकी सांस्कृतिक पहचान और बिक्री प्रभावित हुई है। 'पान खाये सैंया हमार' जैस ...और पढ़ें

पान खाये सैंया हमार: परंपरा पर महंगाई का दाग।
HighLights
पान के पत्तों की कीमत में चार-पांच गुना वृद्धि।
मिथिलांचल-सीमांचल की सांस्कृतिक पहचान पर गहरा असर।
गुटखा और पान मसाला का चलन तेजी से बढ़ा।
जागरण संवाददाता, अररिया। महान आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास मारे गए गुलफाम पर आधारित फिल्म तीसरी कसम का अमर गीत— “पान खाये सैंया हमार…” कभी यहां की गलियों, चौक-चौराहों और युवाओं की जुबान पर आम था। यह धुन न सिर्फ मनोरंजन, बल्कि मिथिलांचल–सीमांचल की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी रही। लेकिन समय के साथ यह धुन जैसे धीमी पड़ती चली गई।
महंगाई ने बदली आदतें
आज हालात यह हैं कि गुटखा और पान मसाला के बढ़ते चलन तथा पान के पत्तों की बेतहाशा महंगाई ने पान की परंपरागत लोकप्रियता को गहरा झटका दिया है। पिछले एक पखवाड़े में पान के पत्तों की कीमत में चार से पांच गुना तक की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं पान मसाला, सुपाड़ी, जर्दा और अन्य सामग्री भी दो से तीन गुनी महंगी हो गई है।
गुटखा हुआ भारी
इसका सीधा असर पान प्रेमियों की जेब पर पड़ा है। जो लोग पहले दिन में चार-पांच बार पान खाते थे, वे अब एक या दो बार पर ही सिमट गए हैं। पान दुकानदारों के अनुसार मिठा पत्ता अब 15 रुपये प्रति पत्ता और बंगला पत्ता 10 रुपये में बेचा जा रहा है। इससे पान की बिक्री में स्पष्ट गिरावट देखी जा रही है।
मिथिलांचल-सिमांचल की सांस्कृतिक पहचान रहा है पान
जिला अधिवक्ता संघ के सदस्य वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेंद्र मंडल बताते हैं कि पान मिथिलांचल और सीमांचल की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। मिथिला की पहचान पान, मखान और मधुर बोली से जुड़ी रही है। आज भी ग्रामीण इलाकों में मेहमानों का स्वागत पान से किया जाता है। पान पर आधारित लोकगीत और परंपराएं गांवों में लंबे समय तक प्रचलित रही हैं।
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पान की लोकप्रियता के कारण हजारों छोटे व्यवसायी इससे जुड़े रहे, जिनकी आजीविका इसी पर निर्भर थी। लेकिन अचानक बढ़ी महंगाई ने न सिर्फ पान प्रेमियों, बल्कि पान व्यवसायियों को भी संकट में डाल दिया है। इसके उलट गुटखा और कृत्रिम माउथ फ्रेशनर्स का चलन तेजी से बढ़ा है, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा माना जाता है।
गुटखा का बढ़ता चलन बना चिंता का विषय
जिले में करीब सात से आठ हजार पान दुकानें हैं, जहां गुटखा की खुलेआम बिक्री हो रही है। ग्रामीण इलाकों की किराना दुकानों में भी गुटखा आसानी से उपलब्ध है। कई जगहों पर तो सिर्फ गुटखा बेचने वाली दुकानें ही संचालित हो रही हैं।
बंगाल से आता है पान
जानकारों के अनुसार इस इलाके में पान मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल के तामलुक (प्राचीन ताम्रलिप्ति) से आता है। तामलुक का मिठा पत्ता यहां खासा लोकप्रिय है। कुछ दुकानों पर मगध क्षेत्र से मगही पत्ता भी मंगाया जाता है।
अररिया कचहरी के समीप पान दुकानदार विभेद झा बताते हैं कि पहले एक थापी (70–90 पत्ते) मिठा पत्ता 100 से 150 रुपये में मिल जाता था, जो अब 500 से 700 रुपये तक पहुंच गया है। पान की अन्य सामग्री की कीमतों में भी दो से चार गुना तक बढ़ोतरी हुई है। महंगाई और बदलती आदतों के बीच अब सवाल यह है कि क्या कभी “पान खाये सैंया हमार” की धुन फिर से गलियों में गूंज पाएगी, या यह सिर्फ यादों तक ही सीमित रह जाएगी।
पान खाये सैंया हमार
यह गीत 1966 में बनी हिंदी फिल्म तीसरी कसम का है, जो महान कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफ़ाम पर आधारित है। गीत को शैलेंद्र ने लिखा और शंकर–जयकिशन ने संगीत दिया। इसे आशा भोसले ने अपनी आवाज़ दी, जबकि परदे पर वहीदा रहमान व राज कपूर पर फिल्माया गया। गीत लोक-जीवन की सहजता, शृंगार और ग्रामीण स्त्री की चंचलता को बड़े सरल ढंग से सामने लाता है।