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रेस्क्यू के बाद भी संघर्ष: अरवल में रेड लाइट एरिया के दलदल से तो निकलीं, पर रोजगार के बिना पुनर्वास अधूरा

Published: Fri, 10 Jul 2026 03:08 PM (IST)

अरवल में रेड लाइट एरिया से रेस्क्यू की गई महिलाओं का पुनर्वास रोजगार और कौशल विकास के अभाव में अधूरा ...और पढ़ें

एआई जेनरेटेड तस्वीर

एआई जेनरेटेड तस्वीर

अभिषेक कुमार, कलेर (अरवल)। रेड लाइट की तंग गलियों से जब पुलिस किसी महिला या किशोरी को रेस्क्यू कर बाहर निकालती है, तो उस पल हर किसी को लगता है कि अब उसकी जिंदगी बदल जाएगी। 

लेकिन हकीकत है कि रेस्क्यू के बाद भी संघर्ष कम कठिन नहीं होता है। पेट कैसे भरेगा, परिवार कैसे चलेगा और सम्मान के साथ जिंदगी कैसे कटेगी?

हाल ही में भी 16 महिलाओं का रेस्क्यू 

अरवल जिले के रेड लाइट एरिया से वर्षों में कई बार महिलाओं और नाबालिग लड़कियों को मुक्त कराया गया है। हाल ही में भी 16 महिलाओं को रेस्क्यू किया गया। लेकिन रेस्क्यू के बाद उनके पुनर्वास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी रोजगार और कौशल विकास आज भी कमजोर दिखाई देती है। 

यदि किसी महिला के हाथ में हुनर और आय का साधन नहीं होगा, तो उसके सामने फिर उसी अंधेरी दुनिया में लौटने की मजबूरी खड़ी हो जाती है, जिससे उसे बाहर निकाला गया था। 

स्वरोजगार से जोड़ने की ठोस पहल अब तक नहीं

स्थानीय लोगों का कहना है कि कई महिलाएं इस दलदल से बाहर निकलकर सम्मानजनक जीवन जीना चाहती हैं, लेकिन उन्हें सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर, खाद्य प्रसंस्करण, रेडीमेड वस्त्र, अगरबत्ती निर्माण या अन्य स्वरोजगार से जोड़ने की ठोस पहल अब तक नहीं हो सकी है। 

स्वयं सहायता समूहों से जोड़कर बैंक ऋण, प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो उनके जीवन में स्थायी बदलाव संभव है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेस्क्यू केवल पहला कदम है, असली सफलता तब होगी जब इन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जाएगा। 

केवल उन्हें उस जगह से निकाल देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसा सहारा देना जरूरी है जिससे वे अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर सकें और समाज की मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। 

सहानुभूति से अधिक अवसर की जरूरत 

रेड लाइट एरिया की महिलाओं को सहानुभूति से अधिक अवसर की जरूरत है। यदि जिला प्रशासन, समाज कल्याण विभाग, जीविका और स्वयंसेवी संस्थाएं मिलकर पुनर्वास की मजबूत योजना तैयार करें, तो यह बदनाम गली भी नई उम्मीदों की पहचान बन सकती है। 

क्योंकि हर रेस्क्यू तभी सफल माना जाएगा, जब किसी महिला को दोबारा उसी दलदल में लौटने की मजबूरी न रहे। यही किसी भी संवेदनशील समाज और व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी है।

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