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    अरवल: बीमारी में दवा से पहले ढूंढनी पड़ती है खाट, खेतों की मेड़ से होकर तय होता है अस्पताल का सफर

    Updated: Thu, 16 Jul 2026 08:00 AM (IST)

    अरवल के आगनूर चौकी गांव में सड़क न होने से बीमारों को खाट पर डेढ़ किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग तक ले जाना पड़ता है। बरसात में यह समस्या और गंभीर हो ...और पढ़ें

    खेतों की मेड़ से होकर तय होता है अस्पताल का सफर

    खेतों की मेड़ से होकर तय होता है अस्पताल का सफर

    HighLights

    1. आगनूर चौकी में सड़क नहीं, बीमारों को खाट पर ले जाना पड़ता।

    2. बरसात में गांव का संपर्क टूट जाता, मुश्किलें कई गुना बढ़ती।

    3. चुनाव में सड़क के वादे, पर विकास आज भी अधूरा।

    अभिषेक कुमार, कलेर (अरवल)। रात के सन्नाटे में जब आगनूर चौकी गांव में कोई बीमार पड़ता है, तो सबसे पहले दवा नहीं, बल्कि एक खाट खोजी जाती है। चार लोग खाट के चारों कोने पकड़ते हैं और फिर शुरू होता है करीब डेढ़ किलोमीटर का दर्दनाक सफर। 

    खेतों की मेड़, ऊबड़-खाबड़ पगडंडी और अंधेरे रास्तों से गुजरते हुए किसी तरह मरीज को राष्ट्रीय राजमार्ग-139 तक पहुंचाया जाता है। वहां पहुंचने के बाद ही एंबुलेंस या कोई वाहन मिलने की उम्मीद होती है।

    यह कहानी किसी बीते दौर की नहीं, बल्कि अरवल जिले के कलेर प्रखंड के आगनूर चौकी गांव की आज की हकीकत है। आजादी के 79 वर्ष बाद भी लगभग 500 से अधिक आबादी और 100 से ज्यादा परिवारों वाला यह गांव एक पक्की सड़क के इंतजार में है। 

    बरसात में बढ़ जाती है परेशानी

    बरसात आते ही गांव की तकलीफ और गहरी हो जाती है। पगडंडी कीचड़ में बदल जाती है और गांव मानो दुनिया से कट जाता है। किसी गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो या किसी बुजुर्ग की तबीयत अचानक बिगड़ जाए, हर कदम पर रास्ता जिंदगी की परीक्षा लेने लगता है।

    ग्रामीण भीम रजक,रामदयाल पासवान, हेमंत कुमार ,नितीश कुमार, अजय कुमार सुशील देवी ,प्रिंस कुमार बताते हैं कि बिजली तो गांव तक पहुंच गई, लेकिन सड़क और शुद्ध पेयजल आज भी सपना हैं। नल-जल योजना के तहत केवल बोरिंग हुई, मगर घरों तक पानी नहीं पहुंचा। 

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    सड़क नहीं होने से गांव की सबसे बड़ी जरूरत आज भी अधूरी है। इस गांव में खुशियां भी रास्ता देखकर आती हैं। बरसात में बारात गांव तक नहीं पहुंच सकती, इसलिए अधिकांश परिवार गर्मी के दिनों में ही शादी-विवाह करने को मजबूर होते हैं, ताकि खेतों के रास्ते किसी तरह वाहन गांव तक पहुंच सके। 

    चुनाव खत्म होते ही भूल जाते हैं वादा

    ग्रामीण बताते हैं कि चुनाव के समय नेताओं के कदम गांव तक जरूर पहुंचते हैं। सड़क बनाने के वादे होते हैं, भरोसे दिए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांव फिर उसी पगडंडी के सहारे छोड़ दिया जाता है। वर्षों से अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को आवेदन दिए गए, मगर सड़क आज भी फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी।

    आगनूर चौकी का दर्द सिर्फ सड़क का नहीं, बल्कि उस इंतजार का है जिसमें हर बारिश नई मुश्किलें लेकर आती है, हर बीमारी नई चिंता बन जाती है और हर चुनाव एक नया वादा छोड़ जाता है। विकास के चमकते नारों के बीच यह गांव आज भी एक ऐसे रास्ते का इंतजार कर रहा है, जो सिर्फ मिट्टी का नहीं, बल्कि सम्मान और बराबरी के अधिकार का रास्ता भी हो।

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