द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ा बिहार का रहस्य; ओरडीह में आज भी मिलते हैं खास निशान, 1939 की पूरी कहानी
औरंगाबाद के कुटुंबा प्रखंड स्थित ओरडीह पहाड़ी के पास 9 अगस्त 1939 को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक ब्रिटिश युद्धक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस ...और पढ़ें

ओरडीह पहाड़ के समीप शिलापट बता रहा उस समय की कहानी। जागरण
HighLights
1939 में ओरडीह पहाड़ी पर ब्रिटिश विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई थी यह घटना।
हादसे में तीन ब्रिटिश अधिकारी मारे गए थे।
ओम प्रकाश शर्मा, अंबा (औरंगाबाद)। युद्ध भले ही समाप्त हो जाते हों, लेकिन इतिहास कभी नहीं रुकता। मानव सभ्यता में युद्ध और शांति दोनों का अपना अलग महत्व रहा है।
जब मनुष्य अपनी मूलभूत आवश्यकताओं और अधिकारों से वंचित होने लगता है, तब संघर्ष की स्थिति पैदा होती है, जबकि युद्ध की विभीषिका सब कुछ झुलसाने लगे तो शांति की आवश्यकता महसूस होती है।
वर्तमान में रूस-यूक्रेन और ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव इसकी मिसाल हैं। औरंगाबाद जिले के कुटुंबा प्रखंड के इतिहास के पन्ने पलटने पर एक महत्वपूर्ण घटना सामने आती है।
विमान में सवार ब्रिटिश सेना के शीर्ष अधिकारियों की हुई थी मौत
आज से करीब 87 वर्ष पूर्व, द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में तत्कालीन गुलाम भारत में एक ब्रिटिश युद्धक विमान यहां दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।
यह घटना 9 अगस्त 1939 की बताई जाती है। कुटुंबा थाना क्षेत्र के ओरडीह गांव के समीप पहाड़ी इलाके में अचानक जोरदार धमाका हुआ था।
विस्फोट की आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनाई पड़ी थी। स्थानीय लोग भयभीत हो गए और समझ नहीं पाए कि आखिर हुआ क्या है।
बाद में पता चला कि एक विमान दुर्घटनाग्रस्त होकर एक कच्चे कुएं में गिर गया था, जिसके बाद उसमें आग लग गई। उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार यह विमान ब्रिटिश रॉयल एयर फोर्स के नंबर-2 (1) विंग का था।
विमान में कुल पांच लोग सवार थे। हादसे में विंग कमांडर समेत चालक दल के दो सदस्यों की मौत हो गई, जबकि दो लोग पैराशूट की मदद से अपनी जान बचाने में सफल रहे।
खैबरपख्तूनवां तत्कालीन भारत अब (पाकिस्तान) से उड़ा था विमान
दुर्घटना के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने ओरडीह पहाड़ी के पास मृतकों की स्मृति में स्मारक बनवाए थे। स्मारकों पर अंकित विवरण के अनुसार, हादसे में मारे गए लोगों में विंग कमांडर बर्टन एंकर्स (DSO, DCM), कॉर्पोरल रॉबर्ट सैमुअल गिल्बर्ट (AC-1) तथा आर्थर रेजिनाल्ड हैरिस (AC-2) शामिल थे।
जानकारी के अनुसार, हादसे में जीवित बचे दो लोगों में रिचर्ड वालेस ब्लॉस और सेसिल रेंडल टैपर शामिल थे। इनमें एक विमान इंजीनियर था, जबकि दूसरा ब्रिस्टल एयरोप्लेन कंपनी का भारतीय क्षेत्र का प्रतिनिधि बताया जाता है।
बताया जाता है कि ब्रिस्टल ब्लेनहेम एमके (L1546 MSN) नामक इस विमान ने तत्कालीन ब्रिटिश भारत के खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत स्थित आरएएफ रिसालपुर हवाई अड्डे से उड़ान भरी थी।
यह क्षेत्र वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित है। कहा जाता है कि उड़ान के दौरान विमान पर बिजली गिर गई, जिससे उसमें आग लग गई और वह ओरडीह के समीप दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
हादसे में विमान इतना क्षतिग्रस्त हो गया था कि उसकी मरम्मत संभव नहीं थी। स्थानीय लोगों के अनुसार, कई वर्षों तक दुर्घटनास्थल के आसपास विमान के मलबे के अवशेष मिलते रहे।
आज भी स्मारक देखने पहुंचते हैं लोग
ओरडीह पहाड़ी के समीप बने इन स्मारकों को देखने आज भी देश-विदेश से लोग पहुंचते हैं। हालांकि समय के साथ स्मारक झाड़ियों से घिर गए हैं।
फिर भी इतिहास में रुचि रखने वाले शोधकर्ता और इतिहासकार यहां पहुंचकर झाड़ियों की सफाई करते हैं तथा स्मारकों पर अंकित तथ्यों का अध्ययन करते हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध और ब्रिटिश शासनकाल से जुड़े इस स्मारक को स्थानीय इतिहास की महत्वपूर्ण धरोहर माना जाता है। इतिहास के जानकार आज भी इस घटना के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करने में जुटे हैं।
ओरडीह का यह स्मारक गुलाम भारत में ब्रिटिश हुकूमत की मौजूदगी और उस दौर की एक दुर्लभ ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है।