मां ने पूछा- कितनी मिली राशि? पिता बोले- DM की कृपा से 4 लाख; बांका में 6 साल बाद दूर हुआ 29 परिवारों का दर्द
Banka News: बांका में जिलाधिकारी अंशुल कुमार की पहल पर प्राकृतिक आपदा पीड़ितों के 29 परिवारों को वर्षों के इंतजार ...और पढ़ें

Banka News: बांका में सिस्टम की शिथिलता पर डीएम का हंटर, वर्षों से अटकी फाइलों को निकाला; 29 पीड़ित परिवारों को मिले 4-4 लाख
HighLights
बांका में 29 परिवारों को मिला 4 लाख का मुआवजा।
डीएम अंशुल कुमार की पहल से लंबित मामले सुलझे।
प्राकृतिक आपदा पीड़ितों को 6 साल बाद मिली राहत।
जागरण संवाददाता, बांका। Banka News: सरकारी दफ्तरों में लालफीताशाही और सिस्टम की संवेदनहीनता किस कदर आम अवाम के जख्मों पर नमक छिड़कती है, इसका जीता-जागता उदाहरण बांका जिले में देखने को मिला। कहीं किसी लाचार पिता ने अपनी मासूम बेटी को कुएं में डूबते देखा, तो कहीं किसी परिवार का इकलौता सहारा सर्पदंश या वज्रपात की भेंट चढ़ गया।
परिजनों ने कलेजे पर पत्थर रखकर मृत्यु प्रमाण पत्र और कागजी औपचारिकताएं तो पूरी कर लीं, लेकिन इसके बाद मुआवजे की फाइलें वर्षों तक प्रशासनिक टेबल पर एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर में धूल फांकती रहीं।
सालों-साल दफ्तरों के चक्कर काटकर जब कई पीड़ित उम्मीद छोड़ चुके थे, तभी जिले के नए जिलाधिकारी अंशुल कुमार की पैनी नजर इन लंबित संचिकाओं पर पड़ी। डीएम की त्वरित पहल और कड़े रुख के बाद सिस्टम की सुस्ती टूटी और एक झटके में सभी 29 पीड़ित आश्रित परिवारों को चार-चार लाख रुपये की अनुग्रह अनुदान राशि जारी कर दी गई।
राशि मिलते ही सालों से आंसू बहा रहे परिवारों के चेहरे पर सुकून लौट आया। घर पहुंचते ही जब एक बुजुर्ग मां ने नम आंखों से पूछा— 'कितनी राशि मिली?', तो वर्षों से सरकारी दफ्तरों के धक्के खा रहे बेबस पिता ने भावुक होकर कहा— 'डीएम साहब की कृपा से पूरे चार लाख रुपये मिल गए।'
2021 से 2025 तक की थीं घटनाएं, 21 डूबने व 8 अन्य आपदाओं के शिकार
विभागीय आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 से लेकर 2025 के दौरान जिले के विभिन्न अंचलों में प्राकृतिक आपदाओं से कई जानें गई थीं। इनमें 21 व्यक्तियों की मौत विभिन्न जलस्रोतों में डूबने से हुई थी, जबकि 8 अन्य लोगों की जान वज्रपात (ठनका), सर्पदंश और अगलगी जैसी आपदाओं के कारण गई थी।
नियमों के तहत आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा मृतक के निकटतम आश्रित को 4 लाख रुपये का सरकारी अनुग्रह अनुदान दिया जाना था। लेकिन स्थानीय स्तर पर अंचल कार्यालयों और कर्मियों की शिथिलता के कारण जांच और कागजी प्रक्रिया के नाम पर मामलों को वर्षों तक अटकाए रखा गया।
जिलाधिकारी ने समीक्षा के दौरान जब यह पाया कि कुछ मामलों में पीड़ित 5-6 वर्षों से भुगतान की बाट जोह रहे हैं, तो उन्होंने गहरी नाराजगी जताते हुए अधिकारियों की क्लास लगाई और रिकॉर्ड समय में कागजी औपचारिकताएं दुरुस्त कर राशि बैंक खातों में हस्तांतरित करने का आदेश दिया।
दर्द जो वर्षों तक फाइलों में दबा रहा
केस 01 (बौंसी): बौंसी की 16 वर्षीय छात्रा मौसमी कुमारी की वर्ष 2021 में कुएं में डूबने से असामयिक मौत हो गई थी। होनहार बेटी को असमय खोने का गम परिवार के सीने में दबा था। परिजनों ने समय पर मृत्यु प्रमाण पत्र और आवेदन भी जमा कराया, लेकिन लालफीताशाही के चलते छह साल तक राशि नहीं मिली। डीएम की पहल पर अब जाकर परिवार को राहत राशि मिली है।
केस 02 (अमरपुर): अमरपुर की नौ वर्षीय अबोध बच्ची रवीना कुमारी की दो वर्ष पूर्व सर्पदंश से जान चली गई थी। मासूम बच्ची की मौत के बाद बेबस परिवार सरकारी अनुग्रह राशि के लिए अंचल कार्यालय के चक्कर काटता रहा। अब जाकर रवीना के परिजनों को चार लाख रुपये की सरकारी सहायता सुलभ हो सकी है।
केस 03 (बेलहर): बेलहर थाना क्षेत्र के कैथाटीकर निवासी अनेश बेसरा की मृत्यु बीते वर्ष पानी में डूबने से हो गई थी। मृतक के वृद्ध पिता महेंद्र बेसरा सरकारी दफ्तरों की दौड़-धूप से थक-हारकर घर बैठ गए थे। समीक्षा बैठक के बाद डीएम के सीधे दखल से उनके खाते में भी राशि भेज दी गई।
केस 04 (कटोरिया): कटोरिया की बसमत्ता पंचायत निवासी अधेड़ लाखो कुमार की दो साल पहले गहरे पानी में डूबने से मौत हो गई थी। घर का कमाऊ सदस्य छिन जाने के बाद उनकी विधवा अंती देवी दाने-दाने को मोहताज थीं। प्रशासन ने अब अंती देवी को 4 लाख रुपये का अनुदान उपलब्ध कराकर उनके आंसुओं को पोंछने का प्रयास किया है।
"आपदा जनित असामयिक मौतों के मामलों में पीड़ित आश्रित परिवारों को दी जाने वाली सरकारी अनुग्रह राशि में किसी भी स्तर पर अनावश्यक देरी अक्षम्य है। समीक्षा के दौरान सामने आए सभी लंबित मामलों का नियमानुसार त्वरित निष्पादन कर पात्र परिवारों को राशि भेज दी गई है। सभी अंचलाधिकारियों व संबंधित पटल सहायकों को सख्त हिदायत दी गई है कि भविष्य में आपदा राहत मामलों का तय समय-सीमा के भीतर निष्पादन करें। किसी भी पीड़ित परिवार को अपनी ही हक की सहायता के लिए अब दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।"
