मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर बना बांका: खपत के बराबर पहुंचा उत्पादन, 3 साल में 3.5 हजार टन की रिकॉर्ड बढ़ोतरी
बांका जिला मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर बन गया है, जो अब स्थानीय मांग पूरी करने के साथ-साथ पड़ोसी जिलों को भी आपूर्ति कर रहा है। ...और पढ़ें
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HighLights
बांका जिला मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर बना।
उत्पादन 2022 से 2025-26 तक 3.5 हजार टन बढ़ा।
केज कल्चर तकनीक से किसानों की आय बढ़ी।
संवाद सूत्र, बांका। उपलब्ध तालाबों और जलाशयों का बेहतर उपयोग तथा सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से मत्स्य उत्पादन लगातार नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है। कभी अपनी जरूरत के लिए दूसरे जिलों पर निर्भर रहने वाला बांका अब मछली उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बन चुका है। जिले में होने वाला उत्पादन स्थानीय मांग पूरी करने के साथ-साथ आसपास के जिलों के बाजारों तक भी पहुंच रहा है।
मत्स्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में जिले में 13.5 हजार टन मछली का उत्पादन हुआ था। विभागीय प्रयास, आधुनिक तकनीक और मत्स्य पालकों की बढ़ती भागीदारी से वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 17 हजार टन तक पहुंच गया। यानी तीन वर्षों में करीब साढ़े तीन हजार टन की वृद्धि दर्ज की गई है। वर्तमान में जिले की वार्षिक मछली खपत भी लगभग 17 हजार टन है, जिससे उत्पादन और मांग के बीच संतुलन स्थापित हो गया है।
जिले में मत्स्य पालन का दायरा लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में 853 सरकारी तालाबों के अलावा करीब पांच हजार निजी तालाबों में मछली पालन किया जा रहा है। हाल के वर्षों में अमरपुर प्रखंड में दो तथा शंभूगंज और बेलहर प्रखंड में एक-एक नए सरकारी तालाब का निर्माण कराया गया है। इससे मत्स्य पालन के लिए उपलब्ध संसाधनों में और विस्तार हुआ है।
मत्स्य विभाग किसानों को विज्ञानी तरीके से मछली पालन के लिए लगातार प्रोत्साहित कर रहा है। इच्छुक किसानों को विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है। साथ ही जिले के भीतर और बाहर प्रशिक्षण देकर आधुनिक तकनीकों की जानकारी भी दी जा रही है। इसका लाभ उठाकर बड़ी संख्या में किसान पारंपरिक खेती के साथ मत्स्य पालन को आय का अतिरिक्त स्रोत बना रहे हैं।
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केज कल्चर से मिल रही नई पहचान
जिले के सभी 10 डैम में मछली पालन किया जा रहा है। इनमें ओढ़नी डैम में केज कल्चर तकनीक से मत्स्य पालन विशेष रूप से सफल रहा है। आकांक्षी जिला योजना के तहत यहां 72 लाख रुपये की लागत से केज स्थापित किए गए हैं। इस तकनीक से सीमित जल क्षेत्र में भी अधिक उत्पादन संभव हो रहा है, जिससे मत्स्य पालकों की आय में वृद्धि हुई है। विभाग भविष्य में भी आधुनिक तकनीकों के विस्तार पर जोर दे रहा है।
सरकारी योजना के तहत तालाब में मछली पालन शुरू किया। पहले सीमित उत्पादन होता था, लेकिन अब वैज्ञानिक तरीके अपनाने से उत्पादन और आमदनी दोनों बढ़ी है।
कुंदन कुमार, धोरैया।
विभाग से प्रशिक्षण मिलने के बाद मछली पालन करना आसान हो गया। अब खेती के साथ मत्स्य पालन भी परिवार की आय का प्रमुख स्रोत बन गया है।
मुकेश कुमार, कटोरिया।
पहले तालाब का पूरा उपयोग नहीं हो पाता था। अब नियमित देखभाल और आधुनिक तकनीक से बेहतर उत्पादन मिल रहा है। बाजार में भी मछली की अच्छी कीमत मिल जाती है।
रूपेश कुमार चौधरी, रजौन।
सरकार की अनुदान योजनाओं से काफी मदद मिली है। अब गांव के कई किसान भी मछली पालन की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इससे रोजगार के साथ अच्छी आमदनी भी हो रही है।
चंदन कुमार, रजौन।