Teachers Day: बांका के ये शिक्षक आज भी किए जाते हैं याद, राष्ट्रपति से मिला था अवॉर्ड
बांका में शिक्षक दिवस पर नित्यानंद सिंह (नित्या बाबू) और सुबोध नारायण सिंह जैसे महान शिक्षकों को याद किया गया। ...और पढ़ें
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नित्यानंद सिंह और सुबोध नारायण सिंह। फोटो जागरण
HighLights
नित्या बाबू RMK स्कूल के प्रधानाध्यापक, अनुशासन के लिए प्रसिद्ध।
सुबोध बाबू मोहनपुर उच्च विद्यालय के विद्वान, राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता।
छात्र आज भी इन शिक्षकों की विरासत को याद करते हैं।
राहुल कुमार, बांका। Teachers Day पर बांका के ऐसे गुरु की कहानी जिनकी कृति उनके गुजरने के वर्षों बाद अब तक सुनी जाती है। इसमें कुछ प्रमुख नामों में एक नित्यानंद सिंह उर्फ नित्या बाबू हैं। वह आरएमके स्कूल के प्रधानाध्यापक रहे।
उनकी सेवानिवृति ही 1983 में हो गई और तीन-चार साल पूर्व से दुनिया से भी विदा हो गए। इसके बाद भी उनके छात्र शहर में सबसे अधिक श्रद्धा और विश्वास से आज भी उनका नाम लेते हैं।
उनके छात्र बताते हैं कि उनके जमाने में अनुशासन सबसे बड़ी ताकत थी। कहते हैं कि उनके गैलरी में घूमने पर बूट की आवाज पूरे स्कूल में गूंजती थी।
सुबोध बाबू को मिल चुका है राष्ट्रपति पुरस्कार
इसी तरह मोहनपुर उच्च विद्यालय के प्रधानाध्यापक रहे सुबोध नारायण सिंह को भी लोग याद करते हैं। उनकी सभी विषयों में विद्वता देख बड़े-बड़े लोग चकित रह जाते थे।
सुबोध बाबू को राष्ट्रपति से शिक्षक पुरस्कार प्राप्त हुआ था। उनके छात्र नागेश्वर साह कहते हैं कि हिंदी, अंग्रेजी के अलावा सामाजिक विज्ञान और विज्ञान हर विषय की बारीक पकड़ सुबोध बाबू को महान बनाता था।
अनुशासन के लिए किए जाते हैं याद
स्थानीय रामकिशेार सिंह, शंकर झा, महेश चक्रवर्ती आदि बताते हैं कि आरएमके आजादी के पूर्व से ही बांका का सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान रहा है। उस समय में आरएमके में पढ़ना भी बड़ी बात होती थी।
तब बड़े हो या सामान्य परिवार सभी के बच्चे आरएमके स्कूल में ही पढ़ते थे, लेकिन नित्याबाबू के जमाने का अनुशासन, फिर दुबारा बांका के किसी स्कूल में नहीं दिखा। पढ़ाई तो पहले से अव्वल दर्जे की रही, लेकिन उनके अनुशासन का शोर उनकी पढ़ाई के चार-पांच दशक बाद भी गूंज रहा है।
वे बताते हैं कि शरारत बच्चों में तब अब से अधिक होती थी। इसके बावजूद क्या, मजाल था कि क्लास के समय पूरे भवन से कहीं शोरगुल की आवाज हो जाय। सरकारी स्कूल होते हुए भी किसी शिक्षक की किसी कीमत पर कोई कक्षा मिस या लेट नहीं होती थी।
बेलहर के गोरगांवा मध्य विद्यालय के शिक्षक दशरथ प्रसाद यादव और शहजानंद शर्मा को आज उनके इलाके में लोग याद करते हैं। स्थानीय विश्वनाथ साह, शंकर दास आदि बताते हैं कि दो-तीन दशक बाद भी इलाके में उनकी पढ़ाई का गुणगान करते हैं। वे अपने हर शिष्य को अभिभावक के तौर पर आगे बढ़ाते थे।
