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    मंदार महोत्सव : 5000 आदिवासियों का हुआ शुद्धिकरण, गुरु माता ने हिंदू धर्म नहीं छोड़ने का दिलाया संकल्प, बोलीं- राम-कृष्ण हैं हमारे आराध्य, सनातन धर्म ही सास्वत

    Updated: Wed, 14 Jan 2026 01:16 AM (IST)

    बांका के मंदार पर्वत पर आयोजित अखिल भारतीय सनातन संताल समाज के महाकुंभ में तीन दिनों में 5000 से अधिक लोगों की सनातन धर्म में घर वापसी हुई है। गुरुमात ...और पढ़ें

    मंदार पर्वत पर आयोजित अखिल भारतीय सनातन संताल समाज में मौजूद आदिवासी समुदाय के लोग और गुरु।

    मंदार पर्वत पर आयोजित अखिल भारतीय सनातन संताल समाज में मौजूद आदिवासी समुदाय के लोग और गुरु।

    HighLights

    1. मंदार महाकुंभ में 5000 से अधिक लोगों की घर वापसी।

    2. गुरुमाता रेखा हेंब्रम ने राम-कृष्ण को आराध्य बताया।

    3. पापहरणी सरोवर संताल समाज के लिए मोक्ष का केंद्र।

    संवाद सहयोगी, बौंसी (बांका)। मंदार पर्वत पर आयोजित अखिल भारतीय सनातन संताल समाज के प्रथम महाकुंभ में सनातन धर्म में घर वापसी का सिलसिला लगातार जारी है। तीन दिनों के भीतर पांच हजार से अधिक लोगों की सनातन धर्म में वापसी कराई गई है। मंगलवार को भी एक हजार से अधिक लोगों को पापहरणी सरोवर में स्नान कराकर शुद्धिकरण कराया गया। इस दौरान मंदार स्थित पापहरणी सरोवर संताल समाज के लिए मोक्ष का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है।


    अखिल भारतीय सनातन संताल समाज की गुरुमाता रेखा हेंब्रम ने कहा कि मंदार संताल समाज का आराध्य स्थल है। भगवान राम और भगवान कृष्ण उनके गुरु हैं। महाकुंभ के माध्यम से समाज को सनातन धर्म की रक्षा का संकल्प दिलाया गया है। साथ ही धर्मांतरण, अंधविश्वास और प्रलोभन से दूर रहने की शपथ भी दिलाई गई।


    धर्मजागरण समन्वय के जिला पूर्णकालिक प्रमुख जीवनलाल कुमार ने बताया कि अब तक पांच हजार से अधिक लोगों की सनातन धर्म में घर वापसी हो चुकी है। झारखंड के गुमला से आए सोहेल मुर्मू ने कहा कि शिक्षा की कमी के कारण आदिवासी समाज में प्रलोभन देकर धर्मांतरण कराया जाता है। वे स्वयं पांच वर्षों तक ईसाई रहे, लेकिन अब सनातन धर्म में लौटे हैं। धर्मरक्षक मनीष कुमार ने बताया कि बुधवार को महाकुंभ के अंतिम दिन हजारों और लोगों की घर वापसी कराई जाएगी।

     

    कड़ाके की ठंड पर भारी आस्था, भक्ति और संस्कृति का संगम

     
    भगवान की भक्ति में अपार शक्ति होती है। जब आस्था और विश्वास दिल से जुड़ते हैं, तब वे शरीर, मन और बुद्धि की अशुद्धियों को दूर कर शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। कुछ ऐसा ही दृश्य इन दिनों मकर संक्रांति से पूर्व मंदार क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। कड़ाके की ठंड के बावजूद यहां आस्थावानों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। भय, चिंता और सर्दी को पीछे छोड़ श्रद्धालु पूरे समर्पण भाव से भगवान के वंदन में लीन नजर आ रहे हैं।

    मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व प्रसिद्ध पाहपहरणी सरोवर में आस्था का सैलाब दिखाई दिया। हाड़ कंपा देने वाली ठंड में भी हजारों श्रद्धालु पुण्य की डुबकी लगा रहे हैं। बीते तीन दिनों से अहले सुबह पापहरणी स्नान, देव दर्शन और दान-पुण्य का क्रम लगातार जारी है। हाथों में पूजा की थाली, सिर पर कलश और मुख पर जय श्रीराम का उद्घोष वातावरण को भक्तिमय बना रहा है।

    पूजन उत्सव के दौरान मंदार क्षेत्र आस्था के साथ-साथ आदिवासी सभ्यता और संस्कृति के रंग में भी सराबोर दिखा। मधुर संताली गीतों, मांदर की थाप और नृत्य-गान के बीच श्रद्धालु मानो भक्ति के सागर में गोते लगा रहे हों। इस दौरान हिंदू, जैन और आदिवासी धर्मों का संगम देखने को मिला, जहां अंग, बंग और संथाल संस्कृति एक साथ जीवंत हो उठी।

    देश के विभिन्न राज्यों के अलावा नेपाल से भी श्रद्धालु मंदार पहुंचे हैं। नेपाल से आए उमेश मुरमुर ने बताया कि वे पिछले दस वर्षों से लगातार पाहपहरणी सरोवर में स्नान और भगवान राम की पूजा के लिए यहां आते हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि भगवान मधुसूदन और प्रभु श्रीराम के दर्शन की लालसा के आगे ठंड का कोई असर नहीं पड़ता।

    मंदार क्षेत्र आदिवासियों के लिए विशेष महत्व रखता है। सफा धर्म के अनुयायियों के आगमन से क्षेत्र में रौनक बढ़ गई है। मंगलवार को करीब 25 हजार से अधिक आदिवासी अपने अनुष्ठानों के साथ मंदार पहुंचे। पुजारी भवेश झा ने बताया कि मकर संक्रांति पर पाहपहरणी स्नान मोक्षदायी माना जाता है और अश्वमेध यज्ञ के समान फल देता है। यही अटूट आस्था सदियों से श्रद्धालुओं को कड़ाके की सर्दी में भी मंदार खींच लाती है। आज बुधवार को पचास हजार से अधिक श्रद्धालु मकर संक्राति को लेकर पापहरणी सरोवर में डुबकी लगाएंगे।


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