11 अगस्त 1942 को सचिवालय पर तिरंगा फहराकर शहीद हुए थे सतीश चंद्र झा; बांका में है देशभक्ति की यह अनमोल पूंजी
बांका के बाराहाट के खड़हारा गांव के बलिदानी सतीश चंद्र झा ने 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराते हुए शहादत दी थी। उनके स्मारक और गांव का प् ...और पढ़ें
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1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हुए थे शहीद; बाराहाट स्टेशन का नामकरण और जर्जर प्रवेश द्वार के जीर्णोद्धार की मांग अधूरी
HighLights
11 अगस्त 1942 को सचिवालय पर तिरंगा फहराते हुए शहीद।
बांका में बलिदानी के स्मारक और प्रवेश द्वार उपेक्षित।
परिवार को शहादत पर गर्व, आर्थिक मदद की अपेक्षा नहीं।
अभिषेक कुमार, बाराहाट (बांका)। बाराहाट प्रखंड के खड़हारा गांव की मिट्टी आज भी अपने अमर सपूत बलिदानी सतीश चंद्र झा की शहादत पर गर्व करती है। उनके पुश्तैनी घर में देशभक्ति की वह विरासत आज भी सांस लेती है, जिसे उनके परिवार ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी संभालकर रखा है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस शहादत पर पूरा देश नाज करता है, उसी बलिदानी के नाम पर बने स्मारक और गांव का प्रवेश द्वार आज उपेक्षा की धूल से ढके पड़े हैं।
तिरंगा फहराते हुए हुए थे शहीद
11 अगस्त 1942 को 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराते हुए अंग्रेजों की गोलियों का सामना करने वाले सतीश चंद्र झा की पांचवीं तक की पढ़ाई गांव के प्राथमिक विद्यालय में हुई थी। बचपन से ही उनके भीतर देशभक्ति की ऐसी अलख थी कि गांव के पास अंग्रेजों के तंबू में आग लगा देने की उनकी निडरता आज भी बुजुर्गों की जुबान पर है।

बाद में पिता के साथ मुंगेर रहने के दौरान वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और पटना कालेजिएट हाई स्कूल में 11वीं के छात्र रहते हुए महज छोटी सी उम्र में देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
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'राष्ट्र के लिए हर त्याग को तैयार'
बलिदानी के छोटे भाई गोपीकांत झा की दूसरी पीढ़ी आज भी उसी पुश्तैनी घर में रह रही है। उनके भतीजे महेश्वरी झा परिवार का पालन-पोषण करने के लिए गांव में एक छोटी-सी किराना दुकान चलाते हैं। एक भतीजा राजस्थान में निजी नौकरी करते हैं, जबकि दूसरे शिक्षा विभाग से क्लर्क पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
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महेश्वरी झा कहते हैं, "हमें सरकार से किसी आर्थिक मदद या सुविधा की अपेक्षा नहीं है। हमें सिर्फ अपने चाचा की शहादत पर गर्व है। यदि आज भी देश को जरूरत पड़े तो हमारा पूरा परिवार राष्ट्र के लिए समर्पित है।"
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स्मारकों की हालत जर्जर
गांव के बुजुर्ग जटाशंकर झा बताते हैं कि वर्षों से बाराहाट रेलवे स्टेशन का नाम बलिदानी सतीश चंद्र झा के नाम पर रखने की मांग उठती रही है, लेकिन यह मांग अब तक फाइलों में ही दबी है।
बलिदानी के नाम पर बना गांव का मुख्य प्रवेश द्वार जर्जर हो चुका है।
ढाकामोड़ पर स्थापित उनकी प्रतिमा के आसपास समुचित सौंदर्यीकरण नहीं हो सका है।
ग्रामीणों का मानना है कि बलिदानियों का सम्मान केवल 15 अगस्त और 26 जनवरी के समारोहों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके स्मारकों को सहेजना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।