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    नागपंचमी पर क्यों बनाया जाता है 'झांप'? बिहार के शिल्पकारों के पुश्तैनी हुनर से तैयार हो रही रंग-बिरंगी सजावट

    Updated: Wed, 22 Jul 2026 04:35 PM (IST)

    नागपंचमी पर्व नजदीक आते ही बखरी, बेगूसराय के शिल्पकार पारंपरिक 'झांप' बनाने में जुट गए हैं, जिसका उपयोग घरों और पूजा स्थलों की सजावट में होता है। यह प ...और पढ़ें

    नागपंचमी पर सजावट और पूजा के लिए होता है झांप का इस्तेमाल

    नागपंचमी पर सजावट और पूजा के लिए होता है झांप का इस्तेमाल

    HighLights

    1. नागपंचमी के लिए बखरी में बन रहे पारंपरिक 'झांप'।

    2. शिल्पकार अरजेंट मालाकार का परिवार जुटा निर्माण में।

    3. कच्चे माल की कमी, सरकारी मदद की है आवश्यकता।

    संवाद सहयोगी, बखरी (बेगूसराय)। नागपंचमी का पर्व नजदीक आते ही बखरी के शिल्पकार पारंपरिक ‘झांप’ बनाने में जुट गए हैं। रंग-बिरंगे कागज, फूल-मालाओं और आकर्षक सजावटी सामग्री से तैयार होने वाला झांप नागपंचमी के अवसर पर घरों और पूजा स्थलों की सजावट में इस्तेमाल किया जाता है।

    बखरी के चैती दुर्गा मंदिर और सलौना सरस्वती स्थान के समीप इन दिनों झांप निर्माण का काम तेजी से चल रहा है।

    नागपंचमी पर सजावट और पूजा के लिए होता है झांप का इस्तेमाल

    नगर परिषद के वार्ड 18 मक्खाचक निवासी शिल्पकार अरजेंट मालाकार के परिवार के लिए झांप बनाना सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि पुश्तैनी कुटीर उद्योग है।

    नागपंचमी के सीजन में मांग बढ़ने के साथ परिवार के सभी सदस्य इसके निर्माण में जुट जाते हैं। पढ़ाई से समय निकालकर बच्चे भी काम में हाथ बंटाते हैं, जबकि उनकी पत्नी फूल-मालाएं तैयार करती हैं।

    अरजेंट मालाकार थोक और खुदरा बिक्री के लिए झांप तैयार करते हैं। उनके मुताबिक, हर सीजन में करीब 15 से 20 हजार झांप तैयार किए जाते हैं।

    सामान्य झांप बनाने में करीब 14-15 रुपये की लागत आती है, जिसे लगभग 20 रुपये में बेचा जाता है। मांग और डिजाइन के अनुसार विशेष झांप की कीमत 200 रुपये तक पहुंच जाती है।

    कोरहला की कमी ने बढ़ाई लागत, थर्मोकोल से तैयार हो रहे झांप

    शिल्पकार के अनुसार झांप बनाने में इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर सामग्री स्थानीय स्तर पर मिल जाती है।

    हालांकि, बारिश की कमी के कारण चौर-चाचर में मिलने वाला पारंपरिक जलीय पौधा ‘कोरहला’ अब आसानी से उपलब्ध नहीं है। इसके कारण शिल्पकारों को इसकी जगह थर्मोकोल का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

    थर्मोकोल और कागज बाजार से खरीदने के कारण झांप निर्माण की लागत बढ़ गई है। अरजेंट मालाकार बताते हैं कि सरस्वती स्थान के अलावा प्रखंड के खड़कचक गांव में भी झांप तैयार किए जाते हैं।

    पर्व के दौरान बढ़ी मांग को पूरा करने के लिए शिल्पकार दिन-रात मेहनत कर रहे हैं।

    रोजी-रोटी इसी पुश्तैनी कारोबार पर निर्भर

    अरजेंट मालाकार का पांच सदस्यीय परिवार पूरी तरह इसी कुटीर उद्योग पर निर्भर है। झांप और फूल-मालाओं की बिक्री से होने वाली आमदनी से परिवार का भरण-पोषण और बच्चों की पढ़ाई चलती है।

    हालांकि, त्योहारों का मौसम खत्म होने के बाद मांग घटने से परिवार को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

    शिल्पकार का कहना है कि यदि सरकार की ओर से आर्थिक मदद, कच्चे माल की उपलब्धता या कारोबार के लिए ढांचागत सहयोग मिले तो इस पारंपरिक कला को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाया जा सकता है।

    इससे न केवल पुश्तैनी हुनर को बचाया जा सकेगा, बल्कि स्थानीय शिल्पकारों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।