'बेटी के ब्याह के पैसे से खरीद रहे राशन' गंगा के कटाव ने छीनी नींद, थाली में चूड़ा-मुड़ी; राघोपुर से ग्राउंड रिपोर्ट
राघोपुर पंचायत का छोटी अलालपुर गांव गंगा के भीषण कटाव और बाढ़ से जूझ रहा है, जहां फसलें बर्बाद हो ...और पढ़ें

Bhagalpur Ganga Katav Ground Report: छोटी अलालपुर में 12 दिनों से आफत, मकई की फसल डूबी; टॉर्च की रोशनी में रातभर पहरेदारी कर रहे ग्रामीण
HighLights
गंगा कटाव से छोटी अलालपुर में फसलें बर्बाद, आर्थिक संकट।
राहत शिविर दूर, ग्रामीण शादी के पैसों से खरीद रहे राशन।
बिजली गुल, ग्रामीण रातभर कटाव स्थल पर दे रहे पहरा।
जागरण संवाददाता, छोटी अलालपुर/राघोपुर (भागलपुर)। राघोपुर पंचायत का छोटी अलालपुर गांव इस वक्त विनाश की सीधी आहट और जिंदगी बचाने की आखिरी उम्मीद के बीच सांसें गिन रहा है। यह वही इलाका है, जो गंगा के आक्रामक कटाव के मुहाने पर खड़ा है और जिसे बचाने के लिए सरकारी अमले ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। सुबह के नौ बज चुके हैं।
आसमान में धूप खिल आई है, लेकिन ग्रामीणों की आंखों से खौफ की स्याह रात का साया अब तक नहीं हटा है। किसी की आंखें उस जलमग्न खेत पर टिकी हैं जहां मकई की लहलहाती फसल जलसमाधि ले चुकी है, तो किसी की बेचैन नजरें तटबंध पर थपेड़े मारती गंगा की लहरों पर।
पिछले 12 दिनों से इस गांव की दिनचर्या सिर्फ दो ही चिंताओं में सिमट कर रह गई है— दिन में खेत और आशियाने को बचाने की फिक्र, और रात में जागकर कटाव पर पहरा।
राघोपुर पंचायत का छोटी अलालपुर गांव 12 दिनों से गंगा के मुहाने पर, डूबने और बचने की जद्दोजहद के बीच जी रहे ग्रामीण
5 रुपये सैकड़ा ब्याज पर कर्ज लेकर बोई थी मकई, पानी फिरने से शादी और कर्ज चुकाने के सारे सपने टूटे
2 किमी दूर राहत शिविर होने से बुजुर्ग व बच्चे भूखे रहने को लाचार, जमा पूंजी खर्च कर चूड़ा-मुड़ी से मिटा रहे भूख
बिजली गुल होने से मोबाइल और टॉर्च की रोशनी में 20-25 ग्रामीण रातभर बारी-बारी से दे रहे हैं तटबंध पर पहरा
पानी से घिरे इस गांव में परिवारों की जमा पूंजी अब धीरे-धीरे राशन के पैकेटों में तब्दील हो रही है। कई घरों के चूल्हे ठंडे पड़ चुके हैं और थाली में दो वक्त के भोजन के नाम पर केवल सूखा चूड़ा और मुड़ी (मुरमुरा) बचा है। नंदकिशोर मंडल, हीरालाल मंडल, उपेंद्र मंडल और मदन मंडल बताते हैं कि उन्होंने पांच रुपये सैकड़ा के भारी ब्याज पर महाजन से कर्ज लेकर मकई की बुआई की थी। नवंबर-दिसंबर के लगन से पहले फसल कटने की उम्मीद थी।
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सोचा था कि फसल बेचकर महाजन का कर्ज भी चुकता कर देंगे और बेटियों के हाथ भी पीले करेंगे। लेकिन बाढ़ के पानी ने खड़ी फसल को लील लिया। अब फसल के साथ-साथ दिहाड़ी मजदूरी और रोजगार के सभी रास्ते बंद हो चुके हैं और सिर पर सिर्फ सूद का बढ़ता बोझ बचा है।
2 किमी दूर राहत शिविर, पेट भरने के लिए टूट रही शादी की बचत
गांव के मोतीलाल मंडल कहते हैं कि इस वक्त सबसे बड़ी प्राथमिकता किसी तरह परिवार की जान बचाना और दो वक्त की सूखी रोटी जुटाना है। काम-धंधा पूरी तरह ठप है और गांव तक सरकारी पका हुआ भोजन नहीं पहुंच रहा है। राहत के तहत भोजन की व्यवस्था तो की गई है, लेकिन शिविर गांव से करीब दो किलोमीटर दूर है। बुजुर्गों, बीमारों, महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए घुटने भर पानी और कीचड़ लांघकर दो किलोमीटर दूर खाना लेने जाना नामुमकिन साबित हो रहा है।
लाचार होकर ग्रामीण अपनी वर्षों की बचत निकाल रहे हैं। जिन पैसों को पाई-पाई जोड़कर बेटियों की शादी के लिए रखा गया था, वे अब चूड़ा, मुड़ी और जरूरी राशन खरीदने में खर्च हो रहे हैं। मांओं के सामने सबसे बड़ा संकट अपने मासूम बच्चों की भूख मिटाना बन गया है।
मवेशियों के चारे का संकट, सिर छिपाने को प्लास्टिक भी मयस्सर नहीं
बाढ़ की मार सिर्फ इंसानों पर ही नहीं, बेजुबानों पर भी पड़ी है। गांव की अधिकांश आबादी खेती और पशुपालन पर टिकी है। खुद को सुरक्षित रखने के साथ-साथ खूंटे पर बंधे मवेशियों की जान और उनके चारे का बंदोबस्त करना भारी पड़ रहा है। लगातार हो रही बूंदाबांदी और बाढ़ से घरों को बचाने के लिए छतों पर डालने वाली प्लास्टिक शीट तक उपलब्ध नहीं हो सकी है, जिससे ग्रामीण खुले आसमान के नीचे भीगने को मजबूर हैं।
टॉर्च की रोशनी में रातभर जाग रहे ग्रामीण, 25 युवकों का पहरा
इलाके में बिजली आपूर्ति पूरी तरह ठप पड़ी है। अंधेरे में डूबे गांव में लोग मोबाइल और टॉर्च की मद्धिम रोशनी के सहारे रात काट रहे हैं। पुरानी रेलवे लाइन के समीप कटाव का दायरा लगातार बढ़ने से खतरे की घंटी बज रही है।
स्थानीय धीरज कुमार शर्मा बताते हैं कि रात के सन्नाटे में गांव को बचाने के लिए 20 से 25 युवाओं की टोली बनाई गई है, जो बारी-बारी से तटबंध और कटाव स्थल की सतत निगरानी करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि रात में यदि जरा सी भी आंख झपकी या लापरवाही हुई, तो समूचा गांव जलप्रलय की भेंट चढ़ जाएगा।
5000 मासिक मदद, फसल मुआवजा और पुनर्वास की गुहार
जिंदगी और मौत के इस दोराहे पर खड़े ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से तत्काल ठोस कदम उठाने की मांग की है। ग्रामीण मोतीलाल मंडल और सुमित कुमार ने मांग उठाई है कि जब तक हालात सामान्य नहीं होते, प्रत्येक प्रभावित परिवार को प्रति माह कम से कम पांच हजार रुपये की सीधी आर्थिक सहायता दी जाए।
इसके साथ ही गांव में तुरंत पर्याप्त पशुचारा, प्लास्टिक शीट्स, मोबाइल चार्जिंग व रोशनी की वैकल्पिक व्यवस्था, बर्बाद हुई फसलों का सरकारी मुआवजा और पानी घटने के बाद कटाव पीड़ितों के लिए सुरक्षित स्थान पर स्थायी पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
