Bhagalpur : खंजरपुर ने देखा है मुगलों का दौर, 400 साल के इतिहास और 80 वर्ष पुरानी दुर्गापूजा में बसती है अनूठी पहचान
Bhagalpur Badi Khanjarpur History: भागलपुर का बड़ी खंजरपुर मोहल्ला 400 साल से अधिक पुराना इतिहास समेटे है, जो मुगलकाल से ...और पढ़ें

Bhagalpur Badi Khanjarpur History: भागलपुर के बड़ी खंजरपुर मां दुर्गा मंदिर।
HighLights
400 साल से अधिक पुरानी ऐतिहासिक पहचान समेटे है खंजरपुर।
इब्राहिम हुसैन खान का 1624 का ऐतिहासिक मकबरा मौजूद है।
80 साल से भव्य दुर्गा पूजा और छठ की अनूठी परंपरा।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। Bhagalpur Badi Khanjarpur History: भागलपुर का बड़ी खंजरपुर मोहल्ला केवल ईंट-पत्थरों के मकानों और गलियों का समूह नहीं है, बल्कि यहां की मिट्टी में चार सदियों से अधिक पुराना समृद्ध इतिहास और गंगा-जमुनी तहज़ीब दफन है। गंगा तट के साए में बसे इस मोहल्ले ने जहां मुगल सल्तनत का दौर देखा, वहीं वक्त के साथ यह धार्मिक, आध्यात्मिक और लोक-सांस्कृतिक गतिविधियों का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा।
इब्राहिम हुसैन खान का ऐतिहासिक मकबरा, करीब आठ दशक पुराना प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर, पारंपरिक मंजूषा कला की कार्यशालाएं और लोक आस्था के महापर्व छठ की अनूठी परंपरा आज भी खंजरपुर के वजूद को जीवंत बनाए हुए हैं।
खंजर बेग और आदम बेग से जुड़ा नामकरण का इतिहास
टीएनबी कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. रविशंकर चौधरी के अनुसार, उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों में खंजरपुर का संबंध मुगल बादशाह अकबर के समकालीन खंजर बेग से जोड़ा जाता है। जनश्रुतियों और अभिलेखों के अनुसार खंजर बेग और आदम बेग दो भाई थे। इन्हीं दोनों भाइयों के नाम पर भागलपुर के दो प्रमुख मोहल्लों—'खंजरपुर' और 'आदमपुर' की नींव पड़ी और नामकरण हुआ।
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इब्राहिम हुसैन खान का मकबरा: बेमिसाल वास्तुकला का नमूना
खंजरपुर की ऐतिहासिक पहचान का सबसे पुख्ता प्रमाण यहां मौजूद इब्राहिम हुसैन खान का मकबरा और मस्जिद है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 20 अप्रैल 1624 को राजमहल के समीप हुए एक भीषण संघर्ष में इब्राहिम हुसैन खान वीरगति को प्राप्त हुए थे। उनके शरीर के एक हिस्से को भागलपुर लाकर इसी खंजरपुर में सुपुर्दे-खाक किया गया था। इस मकबरे की वास्तुकला बेहद आकर्षक है—आयताकार मुख्य भवन के ऊपर विशाल केंद्रीय गुंबद, चारों दिशाओं में छोटी गुंबदनुमा छतरियां और कोनों पर बने सुरक्षा बुर्ज इसे स्थापत्य कला का नायाब उदाहरण बनाते हैं।
आठ दशक पुरानी दुर्गापूजा और थीम आधारित पंडाल
बड़ी खंजरपुर में पिछले आठ दशकों से मां दुर्गा की भव्य पूजा-अर्चना की गौरवशाली परंपरा रही है। पूजा समिति के सदस्य अजीत कुमार यादव और स्थानीय निवासी अरुण साह बताते हैं कि दशकों पूर्व जब यहां बेहद कम आबादी थी, तब भी यह मंदिर पूरे इलाके का सबसे बड़ा लैंडमार्क और सामाजिक मिलन स्थल हुआ करता था। यहां दुर्गापूजा के दौरान कर्नाटक के नंदेश्वर मंदिर, इंडोनेशिया के बाली मंदिर और मुंबई के ताज होटल की तर्ज पर बने कलात्मक पंडाल पूरे जिले में आकर्षण का केंद्र रहे हैं।
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50 वर्षों में वीराने से 1500 घरों की घनी बस्ती तक का सफर
मोहल्ले के 63 वर्षीय बुजुर्ग प्रदीप कुमार बताते हैं कि करीब पांच दशक पहले बड़ी खंजरपुर में बेहद गिने-चुने घर थे और चारों ओर हरियाली व खाली मैदान नजर आते थे। उनके दादा स्व. किशुन गोप के समय से शुरू हुआ बसावट का सफर आज 1500 से अधिक पक्के मकानों और घनी आबादी वाली कॉलोनियों में बदल चुका है।
- 400 साल पुराने इतिहास का गवाह है खंजरपुर, मुगलकालीन मकबरे से लेकर 80 साल पुरानी दुर्गापूजा तक समेटे है अनूठी पहचान
- गलियां ये कहती हैं: कभी गिने-चुने घरों से 1500 मकानों का आबाद मोहल्ला बना बड़ी खंजरपुर, इब्राहिम हुसैन खान के मकबरे से लेकर छठ और मंजूषा कला का संगम
- अकबर कालीन खंजर बेग के नाम पर बसा खंजरपुर; 4 सदियों से अधिक पुरानी ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विरासत का केंद्र
- 1624 में बने इब्राहिम हुसैन खान का ऐतिहासिक मकबरा और अनूठी वास्तुकला आज भी सुनाती है मुगलकाल की गाथा
- आठ दशकों से स्थापित मां दुर्गा मंदिर और भव्य थीम आधारित पंडाल बने हैं मोहल्ले का प्रमुख लैंडमार्क
- 1989 से 21 सूप से शुरू हुई छठ की अनूठी परंपरा, मंजूषा लोककला और गंगा की गोद में पली-बढ़ी है यहां की संस्कृति
गंगा के समीप होने के कारण यह क्षेत्र पुराने समय में जलमार्ग और व्यापारिक गतिविधियों का भी अहम हिस्सा रहा, जिसका प्रभाव आज भी यहां के जनजीवन पर झलकता है।
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21 सूप से 135 सूप तक: छठ महापर्व और मंजूषा कला का संगम
बड़ी खंजरपुर की एक और प्रेरक पहचान यहां की अनूठी सामूहिक छठ पूजा है। 61 वर्षीया व्रती संध्या मिश्रा ने वर्ष 1989 में महज 21 सूप से छठ व्रत का संकल्प शुरू किया था। उस समय उनके ससुर स्व. वीरेंद्र किशोर मिश्रा ने निजी परिसर में विशेष पोखर का निर्माण कराया था। यह परंपरा लगातार बढ़ती गई और वर्ष 2018 में यहां रिकॉर्ड 135 सूप तथा वर्ष 2025 में 140 परिवारों के 69 सूप का अर्घ्य एक साथ समर्पित किया गया।
इसके साथ ही, भागलपुर की प्राचीन लोककला 'मंजूषा' के संरक्षण और प्रशिक्षण की कार्यशालाएं भी इस मोहल्ले में नियमित आयोजित होती हैं, जो खंजरपुर को इतिहास, आस्था और लोक-संस्कृति का एक अनुपम संगम बनाती हैं।
