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तानों को ताकत बना वुशु में चमकीं भागलपुर की निकिता, 3 नेशनल मेडल जीतकर पाई सरकारी नौकरी; अब भारत के लिए खेलेंगी

Published: Fri, 06 Nov 2026 06:59 AM (IST)

Bhagalpur Wushu Player Nikita Success Story: भागलपुर की निकिता ने सामाजिक तानों को अपनी ताकत बनाकर वुशु में तीन राष्ट्रीय ...और पढ़ें

Bhagalpur Wushu Player Nikita Success Story: निकिता ने 3 नेशनल मेडल जीत खेल कोटे से पाई सरकारी नौकरी

Bhagalpur Wushu Player Nikita Success Story: निकिता ने 3 नेशनल मेडल जीत खेल कोटे से पाई सरकारी नौकरी

HighLights

  1. सामाजिक तानों को ताकत बनाकर वुशु में चमकीं निकिता।

  2. तीन राष्ट्रीय पदक जीतकर खेल कोटे से मिली सरकारी नौकरी।

  3. अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने का लक्ष्य।

जागरण संवाददाता, भागलपुर। Bhagalpur Wushu Player Nikita Success Story: जब हौसले बुलंद हों और मंजिल पाने की जिद अटूट हो, तो रास्ते के कांटे भी फूल बन जाते हैं। कभी शाम को वुशु (मार्शल आर्ट) का कड़ा अभ्यास कर घर लौटते समय रास्ते में लोगों की तीखी फब्तियां और तंज सुनने पड़ते थे। हाथ में मार्शल आर्ट की स्टिक देखकर कुछ लोग परिवार पर भी सवाल उठाते थे।

लेकिन भागलपुर के बरारी (ब्राह्मण पश्चिम टोला) की बेटी निकिता ने इन तानों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत बना लिया। उन्होंने अभ्यास जारी रखा और राष्ट्रीय स्तर पर तीन पदक जीतकर आलोचकों को करारा जवाब दिया।

आज जिस खेल पर कभी उंगलियां उठाई जाती थीं, उसी खेल में निकिता की सफलता पर पूरा समाज गर्व कर रहा है। खेल कोटे से सरकारी नौकरी हासिल कर उन्होंने साबित कर दिया कि जब मेहनत बोलती है, तो जमाने की जुबान अपने आप बदल जाती है।

7-8 साल की उम्र में थामी स्टिक, पिता का संबल बना ढाल

निकिता के खेल का सफर वर्ष 2006 में शुरू हुआ, जब वह महज सात-आठ वर्ष की थीं। माउंट कार्मेल स्कूल के खेल शिक्षक राजेश कुमार साह और असिस्टेंट कोच राजीव रंजन के सानिध्य में उन्हें मार्शल आर्ट की बारीकियां सीखने का अवसर मिला।

वर्ष 2008 में स्कूल के गोल्डन जुबली समारोह के दौरान छात्राओं के लिए मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण अनिवार्य किया गया, जिसने निकिता की रुचि को वुशु खेल के प्रति और गहरा कर दिया। शुरुआत में साधन और समझ की कमी थी, लेकिन पिता का अटूट विश्वास निकिता की सबसे बड़ी ढाल बना। सामाजिक विरोध और तानों की परवाह किए बिना उन्होंने नियमित अभ्यास को अपनी दिनचर्या बना लिया।

3 राष्ट्रीय पदक और खेल कोटे से मिली सरकारी नौकरी

निकिता के कड़े पसीने का फल पदकों के रूप में सामने आया। उन्होंने वर्ष 2009 में छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में आयोजित 9वीं जूनियर वुशु राष्ट्रीय चैंपियनशिप में रजत पदक जीतकर राष्ट्रीय स्तर पर धमाकेदार आगाज किया।

इसके बाद वर्ष 2012 में रांची में आयोजित 10वीं जूनियर राष्ट्रीय प्रतियोगिता में कांस्य और मार्च 2013 में कोलकाता के प्रतिष्ठित ईडन गार्डन में हुई 21वीं सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भी कांस्य पदक अपने नाम किया। उनकी इन निरंतर सफलताओं को देखते हुए बिहार सरकार ने वर्ष 2014-15 में उन्हें 'उत्कृष्ट खिलाड़ी' के रूप में सम्मानित किया।

खेल की इस उपलब्धि ने उनके लिए रोजगार के द्वार भी खोले। वर्ष 2019 में खेल कोटे के तहत उन्हें सरकारी सेवा में चयन मिला और वर्तमान में वे पूर्णिया सदर अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) कार्यालय में लिपिक के पद पर निष्ठापूर्वक कार्यरत हैं।

छीयांगशु इवेंट में माहिर, अब बेटियों को आत्मरक्षा का संदेश

निकिता का मुख्य इवेंट 'छीयांगशु' (भाला) है, जिसमें लंबी स्टिक और भाले के साथ शारीरिक संतुलन और जटिल तकनीकी मूव्स का प्रदर्शन किया जाता है। निकिता का मानना है कि चीनी मार्शल आर्ट कुंग फू (वुशु) ने उन्हें सिर्फ मेडल ही नहीं, बल्कि जीवन जीने का असीम आत्मविश्वास दिया है।

कभी फब्तियां सुनकर सिर झुकाए गुजरने वाली निकिता आज हर विपरीत परिस्थिति में खुद की रक्षा करने और दूसरों की मदद करने में पूरी तरह सक्षम हैं। उनका कहना है कि आज के दौर में हर बेटी को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण जरूर लेना चाहिए।

सरकारी नौकरी और तीन राष्ट्रीय पदक जीतने के बाद भी निकिता के कदम थमे नहीं हैं। अब उनकी नजर अंतरराष्ट्रीय फलक पर तिरंगा लहराने पर है। उनका संघर्ष समाज की उन तमाम बेटियों के लिए एक बड़ी मिसाल है, जो सामाजिक बंदिशों या तानों के डर से अपने सपनों की उड़ान भरने से झिझकती हैं।

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