आरा में नाले का गंदा पानी हुआ साफ, खेतों की बुझा रहा प्यास; इको-फ्रेंडली प्लांट में पत्थर व काना लिली से शुद्धिकरण
भोजपुर के हरपुर गांव में 16.93 लाख रुपये की लागत से एक इको-फ्रेंडली 'फायटोराइड' प्लांट स्थापित किया गया है। यह ...और पढ़ें
HighLights
हरपुर गांव में 16.93 लाख का इको-फ्रेंडली फायटोराइड प्लांट।
बिना बिजली गंदे पानी को साफ कर सिंचाई में उपयोग।
पत्थर, कोयला और काना लिली से प्राकृतिक जल शुद्धिकरण।
आनंद प्रकाश, चरपोखरी (भोजपुर)। ग्रामीण क्षेत्रों में जलजमाव और नालियों के गंदे पानी की समस्या से निपटने के लिए भोजपुर के चरपोखरी प्रखंड की मुकुंदपुर पंचायत के हरपुर गांव में इको-फ्रेंडली प्लांट लगाया गया है।
जिला जल एवं स्वच्छता समिति की देखरेख में स्थापित यह 'फायटोराइड' प्लांट बिना बिजली और भारी मशीनरी के गांव के गंदे पानी को साफ कर रहा है।
16.93 लाख की लागत से तैयार हुआ प्लांट
स्वच्छ भारत मिशन और लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत बने इस प्लांट की लागत 16 लाख 93 हजार 500 रुपये है।
इसे मनरेगा की जिला स्तरीय तकनीकी टीम द्वारा तैयार माडल के आधार पर बनाया गया है। परियोजना की 70 प्रतिशत राशि स्वच्छ भारत मिशन और 30 प्रतिशत राशि 15वें वित्त आयोग से मिली है।
एक हजार की आबादी के गंदे पानी का उपचार
यह प्लांट करीब एक हजार ग्रामीणों से निकलने वाले गंदे पानी के दैनिक उपचार के लिए तैयार किया गया है।
शुद्ध होने के बाद यही पानी दोबारा इस्तेमाल के योग्य बन रहा है। साफ किया गया नाले का पानी अब गांव के किसानों के खेतों में सिंचाई के काम आ रहा है।
पत्थर और कोयले की परतों से शुद्धिकरण
फायटोराइड प्राकृतिक और जैविक अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली है। हरपुर में बने प्लांट का ढांचा 50 फीट लंबा और 40 फीट चौड़ा है।
इसमें स्क्रीनिंग चैंबर, 20×10 फीट का सैटलिंग टैंक और 40×15 फीट का स्टोरेज टैंक व फायटोराइड बेड बनाया गया है।
1000 घन फीट कोयला करता है पानी को साफ
प्लांट में बड़े पत्थरों और अलग-अलग आकार की गिट्टियों की परतें बिछाई गई हैं। पानी को गंधहीन और बैक्टीरिया से मुक्त करने के लिए करीब 1000 घन फीट कोयले का इस्तेमाल किया गया है।
नाले का पानी गुरुत्वाकर्षण के जरिए इन परतों से होकर गुजरता है, जिससे 80 प्रतिशत से अधिक गंदगी नीचे बैठ जाती है।
काना लिली की जड़ें सोखती हैं अशुद्धियां
प्लांट के ऊपरी हिस्से में छह इंच बलुई मिट्टी की परत डालकर काना लिली के पौधे लगाए गए हैं। इसकी लंबी और घनी जड़ें पानी में घुली नाइट्रोजन, फॉस्फेट और अन्य अशुद्धियों को सोखती हैं।
साथ ही यह पानी में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने में मदद करती है, जिससे दुर्गंध भी खत्म होती है।
बिना बिजली प्राकृतिक तरीके से हो रहा उपचार
प्रखंड विकास पदाधिकारी कुमार विमलादित्य ने बताया कि घरों से निकलने वाले धूसर जल को नालियों के माध्यम से संयंत्र तक लाया जाता है।
विभिन्न चैंबरों में कार्बन, अन्य जैविक माध्यमों और पौधों की मदद से पानी को प्राकृतिक रूप से फिल्टर किया जाता है। प्रखंड में ऐसे दो प्लांट पर काम चल रहा है, जिसमें हरपुर का संयंत्र चालू हो गया है।
किसानों को सिंचाई के लिए मिल रहा पानी
मुखिया प्रवीण कुमार उर्फ राजू ने कहा कि बिना बिजली और भारी मेंटेनेंस खर्च के प्लांट गांव के गंदे पानी को साफ कर रहा है।
इससे गांव में स्वच्छता बनी है और उपचारित पानी किसानों के खेतों की सिंचाई में उपयोग हो रहा है।
