2018 के बाद आखिर क्यों नहीं हुआ छात्र संघ चुनाव? 8 साल से प्रतिनिधियों का इंतजार, आरा में छात्रों के सामने कई सवाल
वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में 2018 से छात्र संघ चुनाव न होने से शैक्षणिक व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और विद्यार्थियों की ...और पढ़ें

वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय
HighLights
2018 से छात्र संघ चुनाव न होने से व्यवस्था प्रभावित।
छात्रों की सामूहिक आवाज और नेतृत्व कमजोर पड़ा।
कक्षा, परीक्षा, नामांकन, छात्रावास जैसी समस्याएं अनसुलझी।
जागरण संवाददाता, आरा(भोजपुर)। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में वर्ष 2018 के बाद से छात्र संघ चुनाव नहीं होने का असर केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं है। इसका सीधा प्रभाव विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान पर भी पड़ रहा है।
छात्र संघ विद्यार्थियों और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच संवाद का संस्थागत माध्यम होता है। इसके अभाव में बड़ी संख्या में समस्याएं व्यक्तिगत शिकायतों तक सिमट जाती हैं और सामूहिक आवाज कमजोर पड़ जाती है।
छात्र प्रतिनिधि नहीं, सामूहिक आवाज कमजोर
चुनाव नहीं होने का एक दूसरा असर यह है कि विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक नेतृत्व और जिम्मेदारी का व्यावहारिक अनुभव नहीं मिल रहा है।
छात्र दिग्भ्रमित होते हैं कि अपनी सामूहिक समस्याओं को किस मंच पर उठाएं। विश्वविद्यालय प्रशासन और विद्यार्थियों के बीच संवाद का नियमित माध्यम भी कमजोर पड़ता है।
सामाजिक कार्यकर्ता प्रमोद कुमार सिंह कहते हैं कि केवल छात्र संघ चुनाव करा देना ही इन समस्याओं का समाधान नहीं है।
चुनाव के साथ निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही, आचार संहिता, नियमित बैठक, शिकायत निवारण व्यवस्था और विश्वविद्यालय प्रशासन की पारदर्शिता भी जरूरी है।
शिकायतें संगठित तरीके से सामने नहीं आ पातीं
छात्र संघ को भी शैक्षणिक माहौल बनाए रखने और विद्यार्थियों के वास्तविक मुद्दों को प्राथमिकता देने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
यह तभी संभव है, जब चुनाव हों और छात्रों की ओर से उनके प्रतिनिधि चुने जाएं। इससे छात्र हितों की संस्थागत आवाज और जवाबदेही की व्यवस्था मजबूत हो सकती है।
वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे अमरेंद्र कुमार कहते हैं कि विश्वविद्यालय में सबसे बड़ी समस्या नियमित कक्षा संचालन की है।
कई जगह कक्षाएं नियमित नहीं होने, निर्धारित समय पर शिक्षकों की उपलब्धता और पाठ्यक्रम पूरा नहीं होने जैसे सवाल उठते हैं।
कक्षा से परीक्षा तक उठ सकते थे सवाल
निर्वाचित छात्र प्रतिनिधि इन मुद्दों को विभाग और विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने सामूहिक रूप से रख सकते थे। चुनाव नहीं होने से ऐसी शिकायतें संगठित तरीके से सामने नहीं आ पातीं। शिक्षकों की उपस्थिति और समयबद्धता भी विद्यार्थियों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।
शिक्षक समय पर कक्षा में पहुंचे, निर्धारित शैक्षणिक कार्य पूरा हो और विद्यार्थियों को पर्याप्त अकादमिक मार्गदर्शन मिले, इसकी निगरानी में छात्र प्रतिनिधियों की भूमिका हो सकती है।
इसी तरह परीक्षा में कदाचार, परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था और परिणाम में होने वाली गड़बड़ियों पर भी छात्र संघ प्रशासन से जवाब मांग सकता है।
समर्थ पोर्टल से नामांकन प्रभावित, कौन उठाएगा सवाल?
नामांकन प्रक्रिया में तकनीकी गड़बड़ी, गलत नामों का चयन, फर्जी दस्तावेज या गलत तरीके से हुए नामांकन की शिकायतें भी कई बार सामने आती हैं।
छात्र संघ ऐसी शिकायतों को सामूहिक रूप से विश्वविद्यालय के समक्ष रखकर जांच की मांग कर सकता है। इससे पारदर्शिता बढ़ाने का दबाव बनता है।
मौजूदा स्नातक के चालू सत्र 2026-30 में नामांकन प्रक्रिया समर्थ पोर्टल के कारण सुचारू नहीं हो सकी। ऐसे में विद्यार्थियों की समस्याओं को विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने संगठित तरीके से कौन उठाएगा, यह सवाल भी सामने है।
छात्रावास से लेकर छात्रवृत्ति तक कई समस्याएं
विश्वविद्यालय में छात्रावास, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, पेयजल, शौचालय, कैंपस की सुरक्षा, छात्रवृत्ति, शुल्क, प्रमाणपत्र, परीक्षा परिणाम और पोर्टल संबंधी समस्याएं लगातार विद्यार्थियों को प्रभावित करती हैं। अलग-अलग विद्यार्थी जब अपनी शिकायत लेकर पहुंचते हैं तो उनकी आवाज सीमित रह जाती है।
छात्र आशुतोष रजक कहते हैं कि विश्वविद्यालय के किसी कॉलेज में छात्रों के लिए छात्रावास नहीं है। ऐसे मुद्दों को छात्र प्रतिनिधि सामूहिक रूप से विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने रख सकते हैं।
विश्वविद्यालय से निकले कई जनप्रतिनिधि
वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के छात्र संगठन से कई नामचीन जनप्रतिनिधि निकले हैं, जिन्होंने अपनी पहचान बनाई है। पूर्व विधायक मनोज मंजिल, पूर्व विधायक शिव प्रकाश रंजन, पूर्व विधायक अजित कुशवाहा, पूर्व विधायक भाई दिनेश, कयामुद्दीन अंसारी और भाजपा के वरिष्ठ नेता कौशल विद्यार्थी समेत कई नेताओं ने राज्य स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।
कहते हैं छात्र
अनिरुद्ध कुमार: छात्र संघ चुनाव नहीं होने से छात्रहितों की क्षति हो रही है। विभिन्न छात्र संगठन अपने-अपने मुद्दे आगे करते हैं, जिसमें संपूर्ण छात्र-छात्राओं की समस्या शामिल नहीं होती है। इसलिए विश्वविद्यालय स्तर पर छात्र संघ चुनाव जरूरी है।
प्रकाश बजरंगी: सभी कॉलेजों में प्रयोगशाला बंद है। कागज पर ही प्रयोगशाला की औपचारिकता निभाई जाती है। अगर छात्र संगठन होता तो इसको मुद्दा बनाकर आगे किया जा सकता था और शिक्षा विभाग पहल करता।
सत्या सिंह बादल: विश्वविद्यालय प्रशासन से सभी छात्र संगठन चुनाव की मांग करते हैं, लेकिन विश्वविद्यालय इसको गंभीरता से नहीं लेता है। छात्र संघ चुनाव के बाद नियम-परिनियम के तहत छात्र प्रतिनिधि नियुक्त हो जाएंगे।
अंकुर कुशवाहा: विश्वविद्यालय के अधिनियम में छात्र संघ चुनाव का प्रविधान है। विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों की मांगों को अनसुनी कर रहा है। विश्वविद्यालय को छात्र संघ चुनाव कराना ही होगा।
जीतेंद्र रजक: छात्र संगठनों का चुनाव नहीं कराने के पीछे विश्वविद्यालय और शिक्षा विभाग की साजिश है। सरकार अगर विश्वविद्यालय पर दबाव दे तो छात्र संघ चुनाव जल्द हो सकता है।
अमन कुमार: विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव की जरूरत है, क्योंकि सभी छात्र संगठन अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हैं। सभी छात्रों की बात छात्र संघ चुनाव में ही संभव है। विश्वविद्यालय को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
