एक घटना ने बदली जिंदगी, फोरलेन पर 973 से अधिक जिंदगियां बचाकर बिहार के कृष्णा बने 'देवदूत'
डुमरांव के कृष्णा शर्मा पटना-बक्सर फोरलेन पर सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए एक देवदूत बन गए हैं। उन्होंने अब तक 973 से अधिक घायलों को अस्पताल पहुंचाया ...और पढ़ें
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अपने निजी एंबुलेंस के माध्यम से घायल को उपचार के लिए भेजते कृष्णा। (जागरण)
HighLights
कृष्णा शर्मा ने 973 से अधिक घायलों को अस्पताल पहुंचाया।
मां की मृत्यु के बाद खरीदी अपनी निजी एंबुलेंस।
पटना-बक्सर फोरलेन पर दुर्घटना पीड़ितों की निःशुल्क मदद।
संवाद सहयोगी, डुमरांव (बक्सर)। पटना–बक्सर फोरलेन राष्ट्रीय राजमार्ग-922 पर सड़क हादसे का शिकार होने वाले लोगों के लिए प्रतापसागर गांव के कृष्णा शर्मा बड़े मददगार बन रहे हैं।
अब तक वे 973 से अधिक घायलों को सुरक्षित अस्पताल पहुंचा चुके हैं। उनकी तेजी और संवेदनशीलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सिर्फ एक साल में 262 घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाया है। अब तो कई मामलों में हादसे की सूचना उन्हें पुलिस से पहले मिल जाती है।
शुरुआत में वे ऐसे मामलों से दूर रहते थे, क्योंकि कानूनी जटिलताओं और पूछताछ का भय सभी की तरह उन्हें भी था, लेकिन एक दिन सड़क पर तड़पते घायल को देखकर उनका मन टूट गया। उन्होंने उसी क्षण निर्णय लिया कि भय या बाधाएं अब किसी घायल की जिंदगी और मौत के बीच दीवार नहीं बनेंगी।
तब से आज तक वे अपने निजी एंबुलेंस के माध्यम से घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाकर उनका इलाज सुनिश्चित कराते हैं। बक्सर से लेकर पटना और वाराणसी तक वे कई गंभीर मरीजों को नि:शुल्क पहुंचा चुके हैं।
एक हादसे ने बदल दी जिंदगी
कृष्णा बचपन से ही सामुदायिक और धार्मिक कार्यों में आगे रहे। घर में अभाव होते हुए भी वे रामलीला मंडली के कलाकारों के भोजन की व्यवस्था कराते थे। पिता बसंत शर्मा और मां के सहयोग ने बचपन से ही उनके भीतर समाज सेवा का संस्कार भरा।
करीब सात वर्ष पहले उनकी जिंदगी तब बदल गई, जब वे पिता की फर्नीचर दुकान पर बैठे थे और सड़क पर एक अधेड़ व्यक्ति दुर्घटना के बाद तड़पते हुए मदद मांग रहा था। लोग नजर फेरकर गुजर रहे थे, लेकिन कृष्णा ने घायल रामजी (रसड़ा, यूपी) को कई अस्पतालों की शृंखला से होते हुए वाराणसी ट्रामा सेंटर तक पहुंचाया और उनकी जान बच गई। वही घटना उनके जीवन की दिशा बदलने वाला पल बन गई।
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मां को खोने का दर्द बना दूसरों की जिंदगी का सहारा
वर्ष 2018 में अचानक उनकी मां फूल कुमारी देवी को दिल का दौरा पड़ा। चार घंटे तक एंबुलेंस नहीं मिली और देर होने से उनकी मां ने दम तोड़ दिया। यह घटना कृष्णा के मन पर गहरे घाव की तरह बैठ गई। उन्होंने तय किया कि भविष्य में कोई भी परिवार उसी असहाय स्थिति का सामना न करे। इसके बाद उन्होंने खुद एंबुलेंस खरीदी और संकल्प लिया कि कोई भी घायल उपचार से वंचित न रहे।
कृष्णा कहते हैं, 'दूसरों की जान बचाकर जो संतोष मिलता है, वही मेरी असली कमाई है।'
सड़क दुर्घटना में घायलों की मदद करने वाले सराहनीय हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार पुलिस उनसे पूछताछ नहीं कर सकती। मददगारों को सम्मानित करने का प्रविधान भी है। ऐसे लोग समाज के लिए प्रेरणा हैं।
राकेश कुमार, एसडीओ, डुमरांव।