बक्सर से जुड़ी है रक्षाबंधन की पौराणिक कहानी, क्या है ‘येन बद्धो बलि राजा...’ मंत्र का रहस्य?
बक्सर की धरती से रक्षाबंधन के पौराणिक संबंध का वर्णन किया गया है, जहाँ भगवान वामन और राजा बलि की कथा से इस पर्व की उत्पत्ति जुड़ी है।

रक्षाबंधन का बक्सर से जुड़ा है पौराणिक प्रसंग। सांकेतिक तस्वीर
HighLights
बक्सर की धरती से जुड़ा है रक्षाबंधन का पौराणिक महत्व।
भगवान वामन ने राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी।
मां लक्ष्मी ने बलि को राखी बांधकर भाई बनाया।
गिरधारी अग्रवाल, बक्सर। ऋषि-मुनियों की तपोभूमि और सिद्धाश्रम की पावन स्थली बक्सर अनेक पौराणिक एवं धार्मिक प्रसंगों से जुड़ी रही है।
इन्हीं प्रसंगों में रक्षाबंधन का पर्व भी शामिल है। रक्षासूत्र बांधते समय ब्राह्मण और पुरोहित जिस प्रसिद्ध मंत्र का उच्चारण करते हैं, ‘येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥’
उसके पीछे भी बक्सर की धरती से जुड़ी पौराणिक मान्यता बताई जाती है। धार्मिक आख्यानों के अनुसार भगवान विष्णु ने बक्सर की इसी तपोभूमि पर वामन अवतार धारण किया था।
उस समय दैत्यराज बलि अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। भगवान वामन याचक के रूप में उनके समक्ष पहुंचे और दान में तीन पग भूमि मांगी। दानवीर बलि ने उनकी मांग स्वीकार कर ली।
मान्यता है कि भगवान वामन ने विराट रूप धारण कर एक पग में पृथ्वी और दूसरे पग में आकाश नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान न बचने पर राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया।
बलि की दानशीलता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने उन्हें सुतल लोक का अधिपति बनाया। साथ ही भगवान स्वयं भी बलि के द्वारपाल के रूप में वहां रहने लगे।
मां लक्ष्मी ने बलि को बनाया भाई
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान नारायण के सुतल लोक चले जाने से मां लक्ष्मी चिंतित हुईं। तब वह ब्राह्मणी के वेश में सुतल लोक पहुंचीं और दैत्यराज बलि के हाथ में रक्षासूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई बना लिया।
भाई के नाते जब बलि ने उनसे उपहार मांगने को कहा तो मां लक्ष्मी ने भगवान नारायण को अपने साथ बैकुंठ ले जाने की इच्छा जताई। बहन के स्नेह और रक्षासूत्र के बंधन का मान रखते हुए राजा बलि ने भगवान नारायण को मुक्त कर दिया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह प्रसंग सावन पूर्णिमा से जुड़ा है। इसी कारण इस दिन को रक्षासूत्र और भाई-बहन के पवित्र रिश्ते के पर्व के रूप में विशेष महत्व प्राप्त हुआ।
प्रसंग की जानकारी देते हुए आचार्य (प्रो.) रणधीर ओझा बताते हैं कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं, बल्कि धर्म, विश्वास, वचन और कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है। रक्षासूत्र व्यक्ति को अपने दायित्वों के प्रति सजग रहने का संदेश देता है।
रक्षासूत्र बांधते समय मंत्र का महत्व
रक्षासूत्र बांधते समय उच्चारित होने वाले मंत्र ‘येन बद्धो बलि राजा...’ का सामान्य अर्थ है—जिस रक्षासूत्र के बंधन से महाबली दैत्यराज बलि धर्म और वचन की मर्यादा से बंधे थे, उसी रक्षासूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षासूत्र, तुम स्थिर रहो और अपने उद्देश्य से विचलित मत होना।
विद्वान आचार्य कृष्णानंद शास्त्री ‘पौराणिक’ बताते हैं कि रक्षासूत्र केवल एक धागा नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य और संकल्प का प्रतीक है। पुरोहित जब अपने यजमान को रक्षासूत्र बांधता है तो वह उसे धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है।
28 अगस्त को मनाया जाएगा रक्षाबंधन
इस वर्ष रक्षाबंधन शुक्रवार (28 अगस्त) को मनाया जाएगा। पंचांगों के अनुसार श्रावण पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त की सुबह शुरू होकर 28 अगस्त की सुबह समाप्त होगी।
27 अगस्त को भद्रा का प्रभाव रहने के कारण अधिकांश पंचांगों में 28 अगस्त यानी शुक्रवार को रक्षाबंधन मनाना उपयुक्त बताया गया है।
स्थान के अनुसार सूर्योदय और मुहूर्त में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है। सामान्य पंचांग गणना के अनुसार, 28 अगस्त की सुबह पूर्णिमा समाप्त होने से पहले रक्षासूत्र बांधना विशेष रूप से उपयुक्त माना जा रहा है।
