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    मिथिलांचल का अनूठा लोकपर्व मधुश्रावणी 3 से, नवविवाहिताएं 14 दिनों तक खाएंगी बिना नमक वाला खाना

    Updated: Fri, 31 Jul 2026 05:00 PM (IST)

    Madhushravani Date:मिथिलांचल का पवित्र मधुश्रावणी व्रत 3 अगस्त से शुरू होकर 15 अगस्त तक चलेगा, जिसमें नवविवाहिताएं पति की दीर्घायु के लिए 14 दिनों तक ...और पढ़ें

    अनुष्ठान में पुरोहित की भूमिका भी महिलाएं ही निभाती हैं। फाइल फोटो

    अनुष्ठान में पुरोहित की भूमिका भी महिलाएं ही निभाती हैं। फाइल फोटो

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    संवाद सहयोगी, केवटी (दरभंगा)। Madhushravani Vrat: मिथिलांचल की समृद्ध लोकसंस्कृति में सुहाग का अनोखा और पवित्र पर्व 'मधुश्रावणी' श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से शुरू हो रहा है।

    यह 14 दिवसीय अनुष्ठान तीन अगस्त से प्रारंभ होकर 15 अगस्त तक चलेगा। इस दौरान मिथिला की नवविवाहिताएं अपने पति की दीर्घायु और अटूट सुहाग के लिए भगवान भोलेनाथ और माता गौरी की निष्ठापूर्वक पूजा-अर्चना करती हैं।

    बिना नमक का सात्विक भोजन

    पूरे 14 दिनों तक चलने वाले इस कठिन व्रत में नवविवाहिताएं बिना नमक का भोजन ग्रहण करती हैं। इस अनुष्ठान की सबसे खास बात यह है कि इसमें पुरोहित की भूमिका भी महिलाएं ही निभाती हैं।

    पर्व के पहले और अंतिम दिन विशेष विधि-विधान के साथ वृहद पूजन का आयोजन किया जाता है।

    टेमी दागने की प्राचीन परंपरा

    मधुश्रावणी व्रत के अंतिम दिन यानी श्रावण शुक्ल तृतीया को नवविवाहिता की एक अनोखी परीक्षा ली जाती है। इस परंपरा में पति अपनी पत्नी की आंखों को पान के पत्ते से ढक देता है।

    इसके बाद जलते हुए दीपक की बाती से पत्नी के घुटने को स्पर्श कराया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में 'टेमी दागना' कहते हैं।

    प्यार की गहराई का प्रतीक

    पौराणिक मान्यता के अनुसार, टेमी दागने की प्रक्रिया में नवविवाहिता के घुटने पर जितना बड़ा फफोला बनता है, पति-पत्नी के बीच प्रेम उतना ही गहरा माना जाता है।

    इस दौरान सजी-धजी दुल्हन बिना किसी उफ के धैर्यपूर्वक इस अनुष्ठान को पूरा करती है। यह परंपरा मिथिलांचल में युगों-युगों से अटूट प्रेम के प्रतीक के रूप में निभाई जा रही है।

    मायके में मनता है पर्व

    शास्त्रों और परंपरा के अनुसार, नवविवाहिताएं यह पर्व अपने मायके में रहकर ही मनाती हैं। पूजन स्थल को मैनी और बांस के पत्तों से आकर्षक ढंग से सजाया जाता है।

    इसके अलावा मिट्टी से नाग-नागिन और हाथी की सुंदर आकृतियां बनाकर उनकी पूजा की जाती है, जिन्हें अंतिम दिन जल में प्रवाहित कर दिया जाता है।

    हर दिन पौराणिक लोककथाएं

    पंडित आदित्यनाथ झा के अनुसार, 15 अगस्त को व्रत के समापन पर विशेष पूजन किया जाएगा। मधुश्रावणी के दौरान रोजाना अलग-अलग पौराणिक लोककथाएं सुनाई जाती हैं, जिनमें राजा श्रीकर और उनकी पुत्री की कथा प्रमुख है। मान्यता है कि इस पूजन से वैवाहिक जीवन में सदैव मिठास, स्नेह और सुहाग बना रहता है।