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चंपारण की बेटी ने नासा तक पहुंचकर रचा इतिहास, विदेश की नौकरी छोड़ भारत में बनीं वैज्ञानिक

Published: Fri, 06 Nov 2026 07:44 PM (IST)

East Champaran : डॉ. अंशु कुमारी ने मां को खोने के दुख के बावजूद अपनी मेहनत से नासा तक का ...और पढ़ें

नासा में कार्य कर रहीं डा. अंशु कुमारी। सौ. परिवार

नासा में कार्य कर रहीं डा. अंशु कुमारी। सौ. परिवार 

HighLights

  1. मां के निधन के बाद भी अंशु ने पढ़ाई जारी रखी।

  2. नासा में फेलोशिप के बाद भारत लौटीं डॉ. अंशु कुमारी।

  3. वर्तमान में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत हैं।

लक्ष्मीकांत त्रिपाठी, रक्सौल (पूर्वी चंपारण)। यदि हौसले बुलंद हों और सपनों को पूरा करने का जुनून तो जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियां भी सफलता का रास्ता नहीं रोक सकतीं। इसे सच कर दिखाया और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा तक का सफर तय कर विश्व स्तर पर अपने गांव एवं शहर का नाम रोशन की।

रक्सौल खेमचंद ताराचंद महाविद्यालय में प्राणी विज्ञान के सेवानिवृत प्राध्यापक डा. चंद्रमा सिंह और शिक्षा विभाग की पदाधिकारी रहीं दिवंगत सविता कुमारी की बेटी डा. अंशु कुमारी ने।

बारहवीं की पढ़ाई के दौरान मां को खोने का गहरा सदमा झेलने वाली अंशु ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा तक का सफर तय किया। आज वह भारत की प्रतिष्ठित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत हैं।

शिक्षा और संस्कारों से मिली प्रेरणा

शिक्षा को महत्व देने वाले परिवार में पली-बढ़ीं अंशु की प्रारंभिक पढ़ाई जवाहर नवोदय विद्यालय, पूर्वी चंपारण से हुई, लेकिन बारहवीं कक्षा के अंतिम दिनों में कैंसर के कारण मां का निधन उनके जीवन का सबसे कठिन मोड़ साबित हुआ। इस गहरे दुख के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपनी बड़ी बहन डा. सुमी कुमारी से प्रेरणा लेकर उन्होंने आगे बढ़ने का संकल्प लिया।

इंजीनियरिंग से अंतरिक्ष विज्ञान तक का सफर की पूरा

अपने लक्ष्य के प्रति अडिग होकर अंशु ने राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार इंजीनियरिंग में बीटेक किया। इसके बाद उन्हें बेंगलुरु स्थित भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान में खगोलीय उपकरण विकास के क्षेत्र में एकीकृत एमटेक और पीएचडी करने का अवसर मिला।

अपने शोध के दौरान उन्होंने संस्थान की गौरीबिदनूर रेडियो वेधशाला में सूर्य और अंतरिक्ष से आने वाली रेडियो तरंगों के अध्ययन के लिए दो वैज्ञानिक उपकरण विकसित किए।

उनके उत्कृष्ट शोध को एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी आफ इंडिया के प्रतिष्ठित केडी अभ्यंकर और जस्टिस ओक सर्वश्रेष्ठ शोध प्रबंध पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। वर्ष 2022 में उन्हें अंतरराष्ट्रीय रेडियो विज्ञान संगठन यूआरएसआई का युवा वैज्ञानिक पुरस्कार भी मिला।

फिनलैंड से नासा तक लहराया परचम

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान में शोध कार्य के बाद अंशु ने फिनलैंड की यूनिवर्सिटी आफ हेलसिंकी में दो वर्षों तक पोस्टडाक्टोरल शोधकर्ता के रूप में कार्य किया। इसके बाद उन्हें नासा की प्रतिष्ठित पोस्टडाक्टोरल फेलोशिप मिली।

नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर में उन्होंने अंतरिक्ष-आधारित रेडियो वैज्ञानिक उपकरणों की संकल्पना और डिजाइन पर काम किया। उन्होंने वर्ष 2023 और 2024 में नासा के सौर रेडियो ग्रहण अवलोकन अभियानों की टीम का नेतृत्व भी किया। उनकी इन उपलब्धियों ने चंपारण की बेटी को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय में विशेष पहचान दिलाई।

विदेश छोड़कर देश सेवा को चुना

नासा में फेलोशिप शुरू होने के लगभग एक वर्ष बाद उन्हें भारत की भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला में फैकल्टी पद का प्रस्ताव मिला। उन्होंने स्वदेश लौटकर देश के वैज्ञानिक विकास में योगदान देने का निर्णय लिया। वर्तमान में वह सूर्य और अंतरिक्ष मौसम के अध्ययन के लिए भू-आधारित एवं अंतरिक्ष-आधारित वैज्ञानिक उपकरणों के विकास में जुटी हैं।

परिवार को देती हैं सफलता का श्रेय

डा. अंशु अपनी बड़ी बहन डा. सुमी कुमारी को अपना आदर्श मानती हैं। उनका विश्वास है कि अक्सर हमारे सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हमारे अपने घर में ही होते हैं।

वह अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता के संस्कारों, बहन की प्रेरणा और पति डा. आशुतोष कुमार सिंह के निरंतर सहयोग को देती हैं। मां को खोने के दर्द से लेकर नासा तक पहुंचने की उनकी यात्रा उन बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद बड़े सपने देखती हैं।

चंपारण की यह लाडली बेटी आज अपनी प्रतिभा से न केवल बिहार का नाम रोशन कर रही है, बल्कि भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान को भी नई दिशा दे रही है।

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बेटियां अब बेटों से पीछे नहीं है। जरुरत बेटों की तरह बेटियों को आगे बढ़ाने का है। शिक्षा के साथ-साथ परिवार से मिली संस्कार के बल-बूते पर बेटियां भी अपने दमखम का परिचय दे रही है। शिक्षा, चिकित्सा, सेना, पुलिस सहित विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हुए अपनी सफलता का परचम लहराते हुए देश स्तर पर परिवार का नाम रोशन कर रही है।

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प्रियंका सोनी, अध्यक्ष, लायंस क्लब रक्सौल

बेटियां घर की लक्ष्मी होती है। हमारी संस्कृति में बेटियों घर की समृद्धि व खुशहाली की प्रतीक है। आज शिक्षा सहित हरेक क्षेत्रों में आगे बढ़कर अपने परिवार और देश का नाम रोशन कर रही है। बेटियां सिर्फ दो परिवारों को ही नहीं जोड़ती बल्कि समाज की नींव को भी मजबूत बनाती है। इसलिए बेटियों का सम्मान और उन्हें आगे बढ़ने का समान अवसर देना हमारा कर्तव्य है।

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सोनी देवी, प्रखंड प्रमुख, आदापुर।

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