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बिहार में है 'भूतों का पहाड़', पितृपक्ष में 676 सीढ़ियां चढ़कर सत्तू उड़ाते हैं श्रद्धालु; भगवान राम से भी कनेक्शन

Published: Thu, 10 Sep 2026 03:32 PM (IST)

Pretshila Hill: बिहार के गयाजी में प्रेतशिला पर्वत पर पितृपक्ष के दौरान पिंडदान और सत्तू उड़ाने की अनोखी परंपरा है। ...और पढ़ें

प्रतशिला पहाड़

प्रतशिला पहाड़

डिजिटल डेस्क, गयाजी। बिहार के गयाजी जिले में मुख्य शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर एक रहस्यमयी और पवित्र पहाड़ी स्थित है, जिसे 'प्रेतशिला' या भूतों का पहाड़(Pretshila Hill) के नाम से जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस पर्वत पर आज भी प्रेत-आत्माओं का वास है। 676 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचे जाने वाले इस शिखर पर एक 'प्रेतशिला वेदी' बनी है, जहां श्राद्धकर्म और पिंडदान करने का बहुत बड़ा धार्मिक महत्व है।

अकाल मृत्यु और श्राद्ध का विशेष महत्व

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, जो लोग दुर्घटना, बीमारी या किसी अनहोनी में समय से पहले यानी अकाल मृत्यु का शिकार हो जाते हैं, उनकी आत्माएं शांत नहीं हो पातीं। ऐसे पितरों की आत्मा की शांति के लिए पितृपक्ष के दौरान प्रेतशिला पर पिंडदान(Gaya Pind Daan) किया जाता है। माना जाता है कि इस स्थान पर अर्पित किया गया पिंड सीधे पूर्वज ग्रहण करते हैं, जिससे उन्हें कष्टदायी योनियों से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाती है।

सत्तू उड़ाने की अनोखी परंपरा

अकाल मृत्यु वाले परिवारों में सूतक की परंपरा मानी जाती है, जिसके कारण धार्मिक नियमों के अनुसार सूतक काल में सत्तू खाना वर्जित होता है। प्रेतशिला पर पिंडदान के बाद ही परिजन सत्तू ग्रहण करते हैं।

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प्रेत शीला के धर्मेंद्र गिरी ने बताया कि प्रेतशिला बेदी की काफी महत्व होता है। इस स्थान पर पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष प्राप्ति होती है। यहां दो वेदी है- एक ब्रह्म कुंड और एक प्रेतशिला। यहां जो तालाब है इसका उल्लेख वायु पुराण में भी किया गया है।

पूजा-पाठ के दौरान एक बेहद होता है विशिष्ट अनुष्ठान

सत्तू और तिल का छींटा: पिंडदानी धर्मशिला पर तिल मिश्रित सत्तू उड़ाते हैं। साथ हीं 'उड़ल सत्तू पितर को पैठ हो' इस मंत्र का उच्चारण करते हुए श्रद्धालु चट्टान की पांच बार परिक्रमा करते हैं। धर्मशिला की चट्टान(Pretshila Gaya) में एक सूक्ष्म दरार मौजूद है। ऐसी मान्यता है कि यह दरार सीधे यमलोक तक जुड़ी हुई है।

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उड़ाए गए सत्तू का कण यदि इस दरार में चला जाए, तो भटकती आत्मा को तुरंत मोक्ष प्राप्त होता है। प्रेतशिला पर्वत पर भगवान यमराज का एक मंदिर भी है। यहां लोग समय से पहले मरने वाले अपने परिजनों की फोटो रखते हैं और उनके नाम पर एक पिंडदान करते हैं।

धार्मिक इतिहास और पौराणिक महत्व

प्रेतशिला का इतिहास अति प्राचीन है और इसका वर्णन वायु पुराण तथा विष्णु पुराण में भी मिलता है।

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पहाड़ के नीचे स्थित ब्रह्म कुंड के बारे में कहा जाता है कि प्राचीन काल में यहां भगवान ब्रह्मा ने विशाल यज्ञ किया था और तब यह घी का सरोवर हुआ करता था।

विष्णु और ब्रह्मा के पद-चिह्न 

पर्वत शिखर पर भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के चरण चिह्न (पद-चिह्न) मौजूद हैं। श्रद्धालु अकाल मृत्यु का शिकार हुए परिजनों की तस्वीर विष्णु चरणों में रखकर प्रार्थना करते हैं।

श्रीराम का आगमन 

धर्मेंद्र गिरी ने आगे बताया कि त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण के साथ यहां आकर पिता राजा दशरथ का पिंडदान किया था। श्रीराम के स्पर्श से पहले इस पर्वत को 'प्रेत पर्वत' कहा जाता था, जो बाद में 'प्रेतशिला' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस बात का जिक्र वायु पुराण और गरुड़ पुराण में भी है।

पितृपक्ष के दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने पितरों के उद्धार के लिए इस अद्भुत और पावन धाम में खिंचे चले आते हैं।

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