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    Muharram 2026: गांव में एक भी मुस्लिम नहीं, फिर भी पीढ़ियों से मुहर्रम का ताजिया उठा रहे हिंदू परिवार

    Updated: Fri, 26 Jun 2026 02:51 PM (IST)

    फतेहपुर प्रखंड में हिंदू परिवार पीढ़ियों से मुहर्रम मनाकर गंगा जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं। कई गांवों में मुस्लिम आबादी न होने पर भी वे ...और पढ़ें

    गांव में एक भी मुस्लिम नहीं, फिर भी पीढ़ियों से मुहर्रम का ताजिया उठा रहे हिंदू परिवार

    गांव में एक भी मुस्लिम नहीं, फिर भी पीढ़ियों से मुहर्रम का ताजिया उठा रहे हिंदू परिवार

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    हिमांशु गौतम, फतेहपुर (गया)। फतेहपुर प्रखंड में मुहर्रम का पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गंगा जमुनी तहजीब और सामाजिक समरसता की मिसाल बन चुका है। यहां के करीब 60 गांवों में हिंदू परिवार कई पीढ़ियों से पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ मुहर्रम मनाते आ रहे हैं। खास बात यह है कि इनमें कई ऐसे गांव भी शामिल हैं, जहां एक भी मुस्लिम परिवार नहीं रहते हैं।

    गदहियाटांड़, जेहलीबीघा, बहेरा, मोरवे, मतासो, कोड़या, भगवानपुर, खजूरी, केंदुआ, रक्सी, सतनियां, केवाल, सलैयाखुर्द, राजाबीघा, पतेया, पकरिया, जसपुर और मेयारी समेत दर्जनों गांवों में हिंदू परिवार ताजिया निर्माण कराते हैं और परंपरागत तरीके से मुहर्रम का आयोजन करते हैं।

    कई स्थानों पर पूर्वजों द्वारा निर्मित इमामबाड़ों में फातिहा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए मौलानाओं को आमंत्रित किया जाता है।

    प्रखंड में इस वर्ष मुहर्रम के अवसर पर 103 समितियों ने लाइसेंस के लिए आवेदन दिया है। पिछले वर्ष 106 था। वर्ष 106 लाइसेंसों में लगभग 60 लाइसेंस हिंदू परिवारों और समितियों के नाम से जारी हुए थे।

    क्या कहते हैं ताजिया बनाने वाले?

    पतेया गांव निवासी नरेश पंडित बताते हैं कि उनके गांव में कोई मुस्लिम परिवार नहीं रहता, बावजूद इसके कई पीढ़ियों से मुहर्रम मनाने की परंपरा चली आ रही है। उन्होंने कहा कि पूर्वजों के समय परिवार पर संकट आने पर इमामबाड़े में मन्नत मांगी गई थी और संकट दूर होने के बाद से परिवार मुहर्रम मनाता आ रहा है।

    वहीं, गदहियाटांड़ निवासी रोहन राजवंशी ने बताया कि उनके पूर्वजों ने जिस परंपरा की शुरुआत की थी, उसे आज भी गांव के लोग पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ताजिया निर्माण से लेकर जुलूस तक सभी ग्रामीण मिल-जुलकर आयोजन को सफल बनाते हैं।

    बहेरा गांव के योगेंद्र पासवान ने कहा कि मुहर्रम का पर्व आपसी भाईचारे और सामाजिक एकता का प्रतीक है। गांव के लोग सामूहिक रूप से ताजिया बनवाते हैं और आयोजन के दौरान सभी धर्मों के लोग एक-दूसरे का सहयोग करते हैं।

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    ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि सामाजिक सद्भाव और आपसी सौहार्द को भी मजबूत करती है। फतेहपुर की यह परंपरा आज भी क्षेत्र में भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बनी हुई है।

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