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    अभी ABCD भी पूरी नहीं, लेकिन 195 देशों के झंडे पहचानती है गया की ढाई साल की वाणी; इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में स्थान

    Updated: Fri, 31 Jul 2026 11:12 AM (IST)

    गया की ढाई साल की वाणी कांत ने 195 देशों के राष्ट्रीय ध्वजों को पहचानकर इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज कराया है। इस असाधारण स्मरण शक्ति के ...और पढ़ें

    HighLights

    1. ढाई साल की वाणी ने 195 देशों के झंडे पहचाने।

    2. इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने वाणी को सम्मानित किया।

    3. माता-पिता वाणी को अंतरराष्ट्रीय खेलों के लिए तैयार करेंगे।

    नागेंद्र राही, कोंच। 'कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।' दुष्यंत कुमार की यह पंक्ति उतरेन गांव की महज दो वर्ष 10 माह की नन्ही बच्ची वाणी कांत पर बिल्कुल सटीक बैठती है।

    जिस उम्र में बच्चे रंगों और खिलौनों की दुनिया में खोए रहते हैं, उस उम्र में वाणी दुनिया के 195 देशों के राष्ट्रीय ध्वज देखकर उनका नाम तुरंत बता देती है।

    उसकी इस अद्भुत स्मरण शक्ति और प्रतिभा को देखते हुए इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड ने उसे मेडल, पहचान पत्र (आई कार्ड) और प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया है।

    उतरेन गांव की बेटी बनी पहचान

    गया-गोह मुख्य मार्ग पर स्थित कोंच प्रखंड के उतरेन गांव की रहने वाली वाणी कांत अब पूरे इलाके के लिए गर्व का विषय बन गई है।

    वाणी के दादा राम गोविंद पांडे टिकारी में आधुनिक जांच घर (पैथोलॉजी लैब) संचालित करते हैं और क्षेत्र में उनकी अलग पहचान है। अब इस पहचान को नई ऊंचाई उनकी पोती वाणी ने दी है।

    वाणी का जन्म 17 अगस्त 2023 को हुआ था। उसकी जुड़वां बहन वीरा कांत भी है। दोनों बहनों में वाणी की असाधारण स्मरण क्षमता ने सबसे पहले उसके पिता रविकांत पांडे का ध्यान आकर्षित किया। रविकांत टिकारी स्थित बजाज फाइनेंस शाखा में प्रबंधक हैं।

    ढाई साल की उम्र में दिखी असाधारण प्रतिभा

    रविकांत बताते हैं कि जब वाणी करीब ढाई साल की थी, तब उसने रंगों की पहचान कर उनके नाम बताने शुरू कर दिए। इससे उत्साहित होकर उन्होंने एक दिन खेल-खेल में उसे विभिन्न देशों के झंडों वाला पोस्टर दिखाया।

    पहले करीब 20 देशों के झंडे दिखाए गए और वाणी ने सभी देशों के नाम सही-सही बता दिए। यह देखकर पिता भी चौंक गए। इसके बाद रोजाना झंडों की संख्या बढ़ाई जाने लगी।

    कुछ ही दिनों में वाणी ने 195 देशों के राष्ट्रीय ध्वज और उनके नाम याद कर लिए। आज स्थिति यह है कि किसी भी देश का झंडा दिखाने पर वह बिना झिझक उसका नाम तुरंत बता देती है।

    पिता की मेहनत लाई रंग

    बेटी की प्रतिभा को केवल परिवार तक सीमित न रखते हुए रविकांत ने इंटरनेट के माध्यम से जानकारी जुटाई और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड से संपर्क किया।

    वहां से उन्हें बताया गया कि सीधे गिनीज रिकॉर्ड में नामांकन नहीं होता, बल्कि पहले अन्य मान्यता प्राप्त रिकॉर्ड संस्थाओं में उपलब्धि दर्ज करानी होती है। इसके बाद उन्होंने इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड से संपर्क किया।

    सभी आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड ने वाणी की उपलब्धि को स्वीकार करते हुए उसे मेडल, प्रमाणपत्र, आई कार्ड और रिकॉर्ड बुक प्रदान की।

    एशियन रिकॉर्ड बुक भी कर रही मूल्यांकन

    रविकांत ने बताया कि एशियन रिकॉर्ड बुक ने भी वाणी की प्रतिभा का लाइव वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से परीक्षण किया है।

    संस्था की ओर से उन्हें बताया गया है कि अंतिम प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसका वीडियो विभिन्न राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर भी प्रसारित किया जाएगा।

    मां बोलीं- प्रकृति और पिता दोनों का योगदान

    वाणी की मां पल्लवी मिश्रा कहती हैं कि बेटी की प्रतिभा ईश्वर का आशीर्वाद है, लेकिन उसे सही दिशा देने और लगातार अभ्यास कराने का सबसे बड़ा श्रेय उसके पिता को जाता है। उन्होंने धैर्य और नियमित प्रयास से वाणी की इस क्षमता को निखारा।

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    दादी बोलीं- ईश्वर का वरदान हैं दोनों पोतियां

    वाणी की दादी पुनीता देवी अपनी दोनों जुड़वां पोतियों को परिवार के लिए मां सरस्वती का आशीर्वाद मानती हैं। वह बताती हैं कि वाणी की बहन वीरा भी देशों के झंडे पहचान लेती है।

    हालांक‍ि बालसुलभ स्वभाव के कारण कुछ देर बाद जवाब देने से ऊब जाती है और सामने वाले से ही सवाल पूछने लगती है।

    उन्होंने बताया कि दोनों बच्चियां अभी अंग्रेजी के सभी अल्फाबेट भी पूरी तरह नहीं जानतीं, लेकिन देशों के नाम बड़ी सहजता से बता देती हैं।

    यहां तक कि जिन देशों के झंडे एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं, उनमें भी वाणी बिना भ्रमित हुए सही देश का नाम बता देती है।

    खेलों में देख रहे भविष्य

    रविकांत का कहना है कि वे अपनी दोनों बेटियों की असाधारण स्मरण शक्ति, एकाग्रता और सीखने की क्षमता को देखते हुए उन्हें पारंपरिक पढ़ाई के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेलों के लिए तैयार करना चाहते हैं।

    उनका लक्ष्य है कि भविष्य में दोनों बेटियां तीरंदाजी, बॉक्सिंग और अन्य ओलंपिक खेलों में देश का नाम रोशन करें। इसके लिए बचपन से ही बेहतर प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की दिशा में वे प्रयासरत हैं।