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    146 साल बाद भी बिजली को तरस रहा हथुआ का ऐतिहासिक संस्कृत कॉलेज, 10 में से 9 पद खाली; अब सिर्फ बंट रही डिग्रियां

    Updated: Thu, 02 Jul 2026 02:43 PM (GMT+05:30)

    हथुआ का श्री छत्रधारी संस्कृत महाविद्यालय 146 साल बाद भी बिजली से वंचित है और शिक्षकों के 90% पद खाली हैं, जिससे यह केवल डिग्री बांटने वाला संस्थान बन ...और पढ़ें

    बिजली को तरस रहा हथुआ का ऐतिहासिक संस्कृत कॉलेज

    बिजली को तरस रहा हथुआ का ऐतिहासिक संस्कृत कॉलेज

    HighLights

    1. हथुआ संस्कृत कॉलेज, 146 साल बाद भी बिजली नहीं।

    2. 10 में से 9 शिक्षक पद खाली, पढ़ाई ठप।

    3. कभी संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र, अब सिर्फ डिग्री।

    संवाद सूत्र, हथुआ (गोपालगंज)। उत्तर बिहार में कभी संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा श्री छत्रधारी संस्कृत महाविद्यालय आज अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। वर्ष 1880 में हथुआ राज के संरक्षण में स्थापित इस ऐतिहासिक संस्थान में शिक्षकों और बुनियादी सुविधाओं की ऐसी कमी है कि नियमित शैक्षणिक गतिविधियां लगभग ठप हो चुकी है। 

    हालात यह है कि कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय से संबद्ध यह महाविद्यालय अब पढ़ाई के बजाय केवल शास्त्री की डिग्री देने वाला संस्थान बनकर रह गया है। 

    आधुनिक विषयों के उपाचार्य के कुल 10 पद स्वीकृत

    महाविद्यालय में वर्तमान में 105 विद्यार्थियों का नामांकन है, लेकिन नियमित कक्षाएं नहीं होने से परिसर अधिकांश समय सूना रहता है। कक्षाओं में रखे बेंच-डेस्क और ब्लैकबोर्ड पर जमी धूल खुद इस बात की गवाही देती है कि यहां पढ़ाई की गतिविधियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं। 

    अधिकांश विद्यार्थी केवल परीक्षा में शामिल होकर शास्त्री की डिग्री प्राप्त कर लेते हैं। प्रभारी प्राचार्य श्रीधर नारायण झा ने बताया कि आचार्य एवं आधुनिक विषयों के उपाचार्य के कुल 10 पद स्वीकृत हैं, लेकिन उनके अलावा सभी पद वर्षों से रिक्त हैं। 

    व्याकरण विषय के अवैतनिक शिक्षक डॉ. नागेंद्र पांडेय ही शिक्षण कार्य में सहयोग कर रहे हैं। लिपिक, रात्रि प्रहरी और चपरासी जैसे आवश्यक पद भी खाली पड़े हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है।

    कभी संस्कृत शिक्षा का गौरव था यह संस्थान

    हथुआ राज द्वारा वर्ष 1880 में स्थापित यह महाविद्यालय कभी सारण, गोपालगंज, सिवान, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। यहां से पढ़े अनेक छात्र संस्कृत शिक्षक, आचार्य, ज्योतिषाचार्य और कर्मकांड विशेषज्ञ बने। वेद, व्याकरण, साहित्य, दर्शन और ज्योतिष की शिक्षा के लिए इस संस्थान की अलग पहचान थी।

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    छह महाविद्यालयों में भी उपेक्षा

    सारण प्रमंडल में वर्तमान में केवल छह संस्कृत महाविद्यालय संचालित हैं। इनमें हथुआ का श्री छत्रधारी संस्कृत महाविद्यालय और विजयीपुर का श्रीराम संस्कृत महाविद्यालय प्रमुख हैं। सीमित संख्या में संस्कृत शिक्षण संस्थान होने के बावजूद यहां शिक्षकों की नियुक्ति और संसाधनों की लगातार अनदेखी चिंता का विषय बनी हुई है।

    डेढ़ सौ साल बाद भी नहीं पहुंची बिजली

    महाविद्यालय की स्थापना के लगभग 146 वर्ष बीत जाने के बाद भी परिसर में विद्युत कनेक्शन नहीं है। डिजिटल शिक्षा के दौर में बिजली जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव संस्थान की बदहाल स्थिति को उजागर करता है। महाविद्यालय की देखरेख पांच सदस्यीय प्रबंधन समिति करती है, जिसमें अध्यक्ष और सचिव के अलावा अनुमंडल पदाधिकारी, स्थानीय विधायक एवं सांसद के प्रतिनिधि तथा विश्वविद्यालय का प्रतिनिधि शामिल हैं। 

    स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते शिक्षकों की नियुक्ति, विद्युत सुविधा और नियमित शैक्षणिक व्यवस्था बहाल नहीं की गई तो संस्कृत शिक्षा की यह ऐतिहासिक धरोहर केवल कागजों तक सिमटकर रह जाएगी।