शिक्षक का घर या 'अघोषित बैंक'? डकैती के बाद उजागर हुआ करोड़ों के अवैध सूद और गिरवी का खेल
जमुई के सिमुलतला में 8 दिसंबर को शिक्षक संजीव गुप्ता के घर हुई डकैती को 80 दिन बीत चुके हैं, पर पुलिस खाली हाथ है। वर्दीधारी अपराधियों ने 20-25 लाख के ...और पढ़ें

शिक्षक का घर या अघोषित बैंक
HighLights
शिक्षक के घर 80 दिन पहले हुई थी डकैती।
वर्दीधारी अपराधियों ने 20-25 लाख के जेवर लूटे।
घर से करोड़ों के अवैध सूद-गिरवी का खुलासा।
संदीप कुमार सिंह, सिमुलतला (जमुई)। बिहार के जमुई जिले में 08 दिसंबर की वह सुबह कोई नहीं भूल सकता, जब पुलिस की वर्दी पहनकर आए अपराधियों ने कानून के इकबाल को सरेआम नीलाम कर दिया। टेलवा बाजार के सरकारी शिक्षक संजीव गुप्ता उर्फ बउवा के घर हुई इस सनसनीखेज डकैती को 80 दिन से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन 'सुशासन' की पुलिस अब तक अंधेरे में लाठियां भांज रही है।
मामले में अब तक की प्रगति शून्य है, जबकि इस कांड ने इलाके में चल रहे करोड़ों के अवैध 'सूद और गिरवी' के काले साम्राज्य की पोल खोल दी है।
पुलिस हर पहलू पर काम कर रही
झाझा एसडीपीओ राजेश कुमार इस मामले को पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती मान रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि पुलिस हर पहलू पर काम कर रही है। "सिमुलतला पुलिस (कांड सं. 104/25) पूरी गंभीरता से जांच कर रही है।
अपराधियों ने पुलिस की वर्दी का सहारा लेकर जो दुस्साहस किया है, उसका पर्दाफाश करना हमारी प्राथमिकता है। जल्द ही इस कांड का उद्भेदन कर दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा जाएगा।"
वो 'फिल्मी' सुबह और फर्जी सर्च वारंट
घटना की शुरुआत सुबह 6:30 बजे हुई। शिक्षक संजीव गुप्ता ने जैसे ही दरवाजा खोला, सामने सफेद स्कॉर्पियो से उतरे हथियारों से लैस 'वर्दीधारी' खड़े थे। खुद को चकाई पुलिस बताते हुए उन्होंने 'सर्च वारंट' का नाटक किया।
डरे हुए परिवार के सामने लुटेरों ने बड़ी सटीकता से उसी अलमारी पर हाथ साफ किया, जिसमें 20-25 लाख रुपये के जेवर थे। जाते-जाते वे शिक्षक को थाने आने का हुक्म भी दे गए- एक ऐसा झांसा जिसे समझने में परिवार को देर हो गई।
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"हमारा सोना वापस करो!"
कहानी में सबसे बड़ा मोड़ 4 जनवरी को आया, जब चंद्रमंडी के दो स्वर्ण व्यवसायी (मनोज पोद्दार और अनिल उर्फ मन्नू) दर्जनों ग्राहकों के साथ शिक्षक के घर पहुंच गए। उनका दावा था कि लूटा हुआ सोना उनका है, जो उन्होंने शिक्षक के पास गिरवी रखा था।
इस दावे ने शिक्षक के घर को एक 'अघोषित बैंक' के रूप में उजागर कर दिया, जहां बड़े पैमाने पर जेवर गिरवी रखकर ब्याज का धंधा चल रहा था।
अपनों पर शक: मुखबिरी या साजिश?
अब शिक्षक संजीव गुप्ता ने पलटवार करते हुए उन स्वर्ण व्यवसायियों पर ही शक की सुई घुमा दी है। उनका सवाल वाजिब है: "लुटेरों को कैसे पता था कि सोना किस अलमारी में रखा है?" क्या यह महज इत्तेफाक था या किसी 'भेदी' ने लंका ढाने का काम किया?
मुख्य बिंदु जो अब भी अनुत्तरित हैं
पहचान का संकट: क्या पुलिस उन फर्जी पुलिसवालों का स्केच या सुराग ढूंढ पाई है?
काला कारोबार: गिरवी रखे जाने वाले इस खेल में और कौन-कौन से बड़े नाम शामिल हैं?
80 दिन का सन्नाटा: इतने समय बाद भी पुलिस के हाथ एक भी ठोस सबूत क्यों नहीं लगा?
जमुई की जनता अब यह देख रही है कि क्या पुलिस केवल 'जांच जारी है' का रटा-रटाया बयान देती रहेगी, या खाकी का नाम बदनाम करने वाले इन चेहरों से नकाब हटाएगी।