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पति के साथ कालीन बुनकर बदली किस्मत: ₹50000 लोन लेकर शुरू किया बिजनेस, अब 25-30 हजार महीना कमा रहीं सुमन

Published: Wed, 08 Apr 2026 02:51 PM (GMT+05:30)

सुमन देवी ने अपने दिव्यांग पति के साथ मिलकर गरीबी को मात दी। जीविका समूह से ₹50,000 का ऋण लेकर ...और पढ़ें

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अजित कुमार पांडेय, मोहनियां। दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो इंसान परिस्थितियां विकास में बाधक नहीं बन सकतीं। कभी महिलाओं को अबला माना जाता था। आज ये अपनी मेहनत से समाज को दिशा दे रही हैं। जो अन्य महिलाओं के लिए मिसाल है। गरीबी को मात देकर परिवार का संबल बन रही हैं।

मोहनियां प्रखंड के बेलौड़ी पंचायत के अमरपुरा गांव की सुमन देवी का परिवार कभी आर्थिक तंगी का शिकार था। आठ साल पहले पारिवारिक खर्च चलाना मुश्किल था। दोनों पैर से दिव्यांग पति मजदूरी करने में समर्थ नहीं थे। तब सुमन ने आत्मनिर्भर बनकर गरीबी को मात देने का संकल्प लिया।

आज कालीन उद्योग से परिवार में समृद्धि आई है। अन्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का संदेश दे रही हैं। इस कार्य में दिव्यांग पति का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है।

शंकर जीविका स्वयं सहायता समूह बना आधार

बेलौड़ी पंचायत के अमरपुरा गांव के ओम प्रकाश राम दिव्यांग हैं। दोनों पैर से लाचार होने के कारण वे कुछ करने में असमर्थ थे। दो बच्चों की परवरिश करना मुश्किल था। परिवार आर्थिक तंगी से परेशान था। इस विकट परिस्थिति में सुमन दीदी अबला जीवन से उबरकर सबला बनने की ठानी। अमरपुरा गांव में जीविका समूह चलता था।

इन्होंने सीएम दीदी से संपर्क किया तो उन्होंने समूह से जुड़ने का फायदा बताया। 16 नवंबर 2017 को सुमन दीदी सहारा जीविका महिला ग्राम संगठन के शंकर जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ गईं। कहा जाता है बूंद बूंद से तालाब भरता है। इसी को चरितार्थ करते हुए ये सप्ताह में 10 रुपये बचत करने लगीं।

समूह से जुड़ने के बाद 50 हजार रुपए का मिला ऋण

समूह से जुड़ने के बाद सुमन दीदी ने 50 हजार रुपये का ऋण लिया। जिससे छोटी सी दुकान की। इसकी आमदनी से धीरे धीरे समूह को ऋण का पूरा पैसा लौटा दिया। इसके बाद इनका चयन सतत जीविकोपार्जन योजना (एसजेवाई) के लाभार्थी के रूप में हुई। इस योजना के तहत सुमन दीदी को 37 हजार रुपये मिले। जिससे दुकान का विस्तार किया। इसके बाद इनके हौसले को पंख लग गए।

कालीन बुनाई का लिया निर्णय

दुकान से अच्छी आमदनी होने के बाद सुमन दीदी ने कालीन बुनाई का निर्णय लिया। इनके पति ओम प्रकाश राम कालीन बुनाई करना जानते थे। इन्होंने इस उद्योग में भविष्य की तलाश की।

पति पत्नी दोनों कालीन बुनाई करने लगे। आज इस उद्योग और दुकान से सुमन दीदी को 20 से 25 हजार रुपये महीने का लाभ हो रहा है। अन्य महिलाओं के लिए सुमन दीदी प्रेरणास्रोत बन गई हैं।

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इनका कहना है कि जीविका ने जीवन को बदल दिया। अब ये आत्मनिर्भर बन गई हैं। पति दोनों पैर से दिव्यांग थे। परिवार में भोजन चलाना मुश्किल था। सतत जीविकोपार्जन योजना के तहत चयन नहीं हुआ होता तो दर दर की ठोकरें खानी पड़ती।

आज परिवार खुशहाल है। वे इस उद्योग को बहुत आगे बढ़ाना चाहती हैं। जिससे अन्य महिलाओं को रोजगार भी मिलेगा। कालीन उद्योग में कैमूर जिला का नाम हो।

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सुमन दीदी ने दृढ़ इच्छा शक्ति से गरीबी को मात दी है। ये अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। सतत जीविकोपार्जन योजना से इनके परिवार में समृद्धि आई है।


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उत्कर्ष शुक्ला, जीविका प्रबंधक

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