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    कम लागत, बंपर मुनाफा: बिहार में 'डबल कमाई' का जरिया बना मत्स्य बीज उत्पादन, किसान हो रहे मालामाल

    Updated: Fri, 31 Jul 2026 07:30 AM (IST)

    कटिहार के कदवा प्रखंड में मत्स्य बीज उत्पादन और आधुनिक मछली पालन ग्रामीणों के लिए लाभकारी व्यवसाय बन गया है। यह कम लागत में बेहतर मुनाफा और स्थानीय स् ...और पढ़ें

    कटिहार के कदवा में मत्स्य बीज उत्पादन से किसानों की आय में वृद्धि (AI Generated Image)

    कटिहार के कदवा में मत्स्य बीज उत्पादन से किसानों की आय में वृद्धि (AI Generated Image)

    HighLights

    1. कदवा में मत्स्य बीज उत्पादन और आधुनिक मछली पालन लाभकारी।

    2. कम लागत, अधिक मुनाफा, किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत।

    3. पश्चिम बंगाल से जीरा लाकर वैज्ञानिक विधि से उत्पादन।

    संवाद सूत्र, कदवा (कटिहार)। कदवा प्रखंड में मत्स्य बीज उत्पादन और आधुनिक मछली पालन ग्रामीणों के लिए लाभकारी व्यवसाय बनकर उभर रहा है। कम लागत में बेहतर मुनाफा मिलने से बड़ी संख्या में किसान इस व्यवसाय से जुड़ रहे हैं। तालाबों में मछली के जीरा (फ्राई) से अंगुलिका आकार का बीज तैयार कर उसकी बिक्री की जा रही है।

    वहीं, शेष मछलियों का पालन कर अतिरिक्त आय अर्जित की जा रही है। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो रहे हैं।

    प्रखंड के चांदपुर, गोपीनगर, नंदनपुर, नूनगरा, निझरा, भर्री और दुर्गागंज सहित कई गांवों में दर्जनों तालाबों में मत्स्य बीज उत्पादन और मछली पालन किया जा रहा है। इस व्यवसाय से जुड़े किसानों का कहना है कि वैज्ञानिक तकनीक अपनाने पर कम समय में अच्छा लाभ प्राप्त होता है।

    बंगाल से लाया जाता है मछली का जीरा:

    मत्स्य पालक पश्चिम बंगाल से आक्सीजनयुक्त प्लास्टिक पैक में सिल्वर कार्प, गोल्डेन, रोहू, कतला, बाटा, मृगल सहित अन्य प्रजातियों का मछली जीरा खरीदकर लाते हैं। जीरा की कीमत लगभग 400 से 700 रुपये प्रति बाटी होती है। तालाब की सफाई और आवश्यक तैयारी के बाद उसमें जीरा छोड़ा जाता है।

    इसके बाद नियमित रूप से अंडा, सरसों की खल्ली और अन्य पौष्टिक आहार दिया जाता है। करीब डेढ़ माह में मछलियां अंगुलिका आकार की हो जाती हैं और उनकी प्रजातियों की पहचान भी स्पष्ट हो जाती है।

    इसके बाद मत्स्य बीज की बिक्री शुरू हो जाती है। स्थानीय किसान इन्हीं बीजों को खरीदकर अपने तालाब, पोखर और जलाशयों में छोड़ते हैं।

    दोहरी कमाई का जरिया बना व्यवसाय:

    मत्स्य बीज उत्पादकों के अनुसार एक तालाब से लगभग दो माह में 50 हजार रुपये से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक की आय हो जाती है। वहीं, तालाब में बची मछलियों का छह माह बाद उत्पादन लेकर अलग से आमदनी होती है।

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    दूसरी ओर, कई किसान आधुनिक तकनीक से मछली पालन कर सालाना बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं।

    क्या कहते हैं मत्स्य पालक?

    मत्स्य बीज उत्पादक संजीव चौधरी, बिमल महलदार, चंदन सिंह, प्रकाश महलदार, राजकुमार और रतन कुमार ने बताया कि वैज्ञानिक तरीके से मत्स्य बीज उत्पादन अत्यंत लाभकारी व्यवसाय है। पहले बीज की बिक्री से आय होती है और बाद में तालाब में बची मछलियों की बिक्री से अतिरिक्त कमाई मिलती है। इससे पूरे वर्ष रोजगार के अवसर बने रहते हैं।

    पोखर मालिक सुमन सिंह, दिलीप राज सिंह और विजय ठाकुर ने बताया कि जलाशयों में पाली गई मछलियां एक वर्ष में एक से डेढ़ किलोग्राम तक की हो जाती हैं। शादी-विवाह और अधिक मांग वाले मौसम में मछलियों की कीमत बेहतर मिलती है, जिससे इस व्यवसाय में अच्छा लाभ प्राप्त होता है।