कटिहार : मखाना ने फीका कर दिया देसी मछली का स्वाद
कटिहार में मखाना की बढ़ती खेती के कारण देसी मछलियों की प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से कवई, पोठी, झिंग ...और पढ़ें

कटिहार में अब इसी प्रकार की मछली मिल रही है
HighLights
मखाना की खेती से देसी मछलियां विलुप्त हो रही हैं।
रासायनिक खाद, कीटनाशक मछलियों के लिए घातक साबित हुए।
पारंपरिक मछुआरों की आजीविका पर गहरा असर पड़ा।
संवाद सूत्र, कदवा (कटिहार)। कवई, पोपता, पोठी, झिंगा सहित कई देसी प्रजाति की मछलियां के स्वाद को लोग भूलने लगे हैं। स्वाद एवं पौष्टिकता से भरपूर प्रचुर मात्रा मिलने वाली देसी मछली के विलुप्ति के कगार पर पहुंच गया है। इसकी वजह से तालाब की मछली के साथ बाहर के प्रदेशों से आयातित मछली का व्यापार बढ़ गया है। इसके पीछे मखाना की खेती का बढ़ता रूझान बताया जाता है।
हाल के वर्षों में छोटे बड़े जलाशयों के साथ जलजमाव वाले क्षेत्रों में मखाना की कृषि बढ़ी है। मखाना की कृषि में रासायनिक खादों का प्रयोग के साथ अंधाधुंध घातक कीटनाशक का उपयोग की वजह से कई देसी प्रजाति की मछलियां विलुप्त हो गई है या फिर विलुप्ति के कगार पर है। अब गाहे बगाहे ही काफी कम मात्रा में देसी कवई, झिंगा, पोठी, पोलवा, पोपता, सिंघी, मोंगरी सहित कई मछली का दर्शन बाजार में होता है, जबकि कुछ वर्ष पूर्व तक क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में इस प्रकार की मछलियां मिलती थी।
क्षेत्र में कई जलाशय देसी मछली के लिए विख्यात था। सुबह होते ही लोग जलाशयों के तट पर मछली की खरीददारी के लिए पहुंच जाते थे। देसी मछली स्वाद एवं पौष्टिकता से भरपूर होता है। वहीं, मछली पकड़ने के कार्य कर दर्जनों लोग अपनी आजीविका चलाते थे। क्षेत्र के बाजारों में तालाब में पालने वाली मछली के साथ आंध्रप्रदेश, बंगाल एवं झारखंड से आने वाली मछली बिक रही है। देसी कवई, सिंघी, पोपता, रेहु, कतला आदि का हाई ब्रीड उपलब्ध हो गया है, लेकिन स्वाद के मामले में यह देसी का मुकाबला नहीं कर पाता है।
अगर कहीं देसी मछली मिलती है तो वह मुंह मांगी कीमतों पर बिक जाती है। परंपरागत रूप से देसी मछली को मार कर बिक्री करने वालों का रोजगार भी प्रभावित हुआ है। इससे जुड़े कामगार अब दूसरा धंधा अपना लिया है। इस संबंध में मछली पकड़ने का कार्य करने वाले मधुसूदन शर्मा, रतन महलदार, राजकुमार महलदार, छोटू महलदार सहित कई ने बताया कि जलाशयों में मखाना की कृषि होने की वजह से अब देसी मछली नहीं मिलती है। ऐसे में वे लोग खेतों से मखाना निकालने के साथ अन्य रोजगार कर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।