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    गोरखा रेजिमेंट में नेपाली युवकों की भर्ती पर संकट, अग्निवीर योजना ने लगाया ब्रेक!

    Updated: Sun, 11 Jan 2026 01:23 PM (IST)

    अग्निवीर योजना के कारण भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट में नेपाली नागरिकों की भर्ती पर असर पड़ रहा है। दशकों से चली आ रही यह परंपरा भारत-नेपाल संबंधों क ...और पढ़ें

    गोरखा सैनिक। फाइल फोटो

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    बीरबल महतो, ठाकुरगंज (किशनगंज)। गोरखा सैनिक दशकों से वे भारतीय सेना का अभिन्न हिस्सा है। वर्तमान में भारतीय सेना की विभिन्न रेजिमेंटों में लगभग 30 से 40 हजार नेपाली गोरखा सैनिक सेवा दे रहे हैं।

    वर्ष 1947, 1962, 1965, 1971 के युद्धों से लेकर कारगिल संघर्ष और आतंकवाद विरोधी अभियानों तक में गोरखा सैनिकों की भूमिका ऐतिहासिक और निर्णायक रही है। लेकिन अग्निवीर योजना लागू होने के बाद गोरखा रेजिमेंट में नेपाली नागरिकों की बहाली पर असर पड़ रहा है।

    जिले के ठाकुरगंज प्रखंड से सटे नेपाल के झापा जिले के भद्रपुर, बनियानी, हिमाली, चन्द्रगुड़ी, सागरमाथा, ज्ञानी चौक, केचना, पृथ्वीनगर, लाहूरे चौक, विराटामोड़, पाठामारी जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों के नेपाली नागरिक दशकों से भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट में भर्ती होते रहे हैं।

    यह परंपरा केवल रोजगार का माध्यम नहीं रही, बल्कि भारत-नेपाल के बीच गहरे सैन्य, सामाजिक और ऐतिहासिक संबंधों की मजबूत कड़ी भी रही है। वर्ष 1947 में भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते के तहत नेपाली नागरिकों की भारतीय सेना में भर्ती की व्यवस्था की गई थी, जो आजादी के बाद से लगातार चलती रही। लेकिन हाल के वर्षों में लागू की गई अग्निवीर भर्ती योजना के कारण इस ऐतिहासिक व्यवस्था पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।

    नेपाली युवाओं के लिए कम हो रहे मौके 

    अग्निवीर योजना के तहत भर्ती प्रक्रिया में आए बदलावों और नियमित बहाली में आई रुकावटों के चलते नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में चिंता बढ़ गई है। किशनगंज जिले के प्रखंड ठाकुरगंज से सटे नेपाल के क्षेत्रों से आज भी सैकड़ों नेपाली नागरिक भारतीय सेना की विभिन्न गोरखा बटालियनों में सेवा दे रहे हैं, लेकिन अग्निवीर भर्ती योजना के कारण नई भर्ती नहीं होने की स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में यह संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है।

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    नेपाल के झापा जिले के हिमाली गांव निवासी एवं गोरखा रेजिमेंट के पूर्व सैनिक पसांग क्षेत्री, सुभाष लामा, अमरजीत लिम्बु, सत्यप्रकाश ईजम, दीपेश गुरुंग सहित अन्य पूर्व सैनिकों का कहना है कि अग्निवीर योजना से पहले हर वर्ष हजारों नेपाली युवा गोरखा रेजिमेंट में भर्ती होते थे।

    अब नई भर्ती लगभग ठप होने से गोरखा रेजिमेंट में नेपाली नागरिकों की भूमिका पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि भारतीय सेना की लगभग 35 बटालियनों में गोरखा सैनिक तैनात हैं, जिनमें नेपाली नागरिकों की भागीदारी हमेशा महत्वपूर्ण रही है।

    हिमाली गांव के सेवानिवृत्त गोरखा सैनिकों का मानना है कि अग्निवीर योजना लागू करते समय भारत सरकार ने नेपाल जैसे मित्र देश के साथ राजनयिक शिष्टाचार का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया है।

    टूट रहा सेना में भर्ती होने का सपना

    युवा नेपाली गोपाल गुरुंग और सिद्धार्थ सिंह का कहना है कि उनके पूर्वज भारतीय सेना में सेवा कर चुके हैं और वे भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन नेपाल सरकार द्वारा वर्ष 2022 में भारत के भर्ती नियमों में बदलाव के विरोध में गोरखा भर्ती प्रक्रिया को निलंबित किए जाने के बाद नेपाली युवाओं के सामने भारतीय सेना में शामिल होने का विकल्प लगभग समाप्त हो गया है।

    वहीं एक भूतपूर्व नेपाली गोरखा सैनिक ने बताया कि अग्निवीर योजना के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं, इसलिए इसे पूरी तरह खारिज करने के बजाय भारत सरकार से संवाद कर समाधान निकाला जाना चाहिए। नेपाल स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार इस मुद्दे पर भारत और नेपाल सरकार के बीच बातचीत जारी है।

    नेपाल - भारत मैत्री संघ (झापा) के अध्यक्ष प्रदीप रेगमी का कहना है कि गोरखा रेजिमेंट केवल एक सैन्य इकाई नहीं, बल्कि भारत-नेपाल के मजबूत द्विपक्षीय संबंधों का प्रतीक है। ऐसे में भर्ती प्रक्रिया में दीर्घकालिक रुकावट का असर दोनों देशों के पारंपरिक रिश्तों और सीमावर्ती क्षेत्रों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।