मिथिला की प्राचीन सूर्य प्रतिमाएं अब पहुंचेंगी यूनेस्को, छठ को मिलेगा वैश्विक सम्मान
इंटैक बिहार चैप्टर छठ पूजा को यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए बिहार की 145 सूर्य प्रतिमाओं की जानकारी यूनेस्को को भेजेगा। इसम ...और पढ़ें
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द्वादश आदित्य की दुर्लभ प्रतिमा। जागरण
HighLights
इंटैक बिहार 145 सूर्य प्रतिमाओं की जानकारी यूनेस्को को भेजेगा।
मधुबनी की द्वादश आदित्य प्रतिमा को विशेष महत्व दिया गया।
छठ को यूनेस्को सूची में शामिल करने का प्रयास जारी।
मदन लाल कर्ण, बाबूबरही (मधुबनी)। बिहार की लोक आस्था का महापर्व छठ, जिसे यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए कदम उठाया गया है। इसे और बल प्रदान किया जा रहा है।
इंटैक के बिहार चैप्टर द्वारा मधुबनी जिले के बाबूबरही प्रखंड के बरुआर गांव में स्थापित द्वादश आदित्य की अति प्राचीन प्रतिमा सहित राज्य की 145 सूर्य प्रतिमाओं की तस्वीर, उनका इतिहास और संदर्भ यूनेस्को को भेजा जाएगा। छठ पूजा में सूर्य की आराधना की जाती है।
इंटैक के इस दस्तावेजीकरण में मधुबनी की पांच प्रतिमाओं को विशेष महत्व दिया गया है, जिनमें अंधराठाढ़ी, भोजपंडौल, भगवतीपुर, राजनगर और रखबारी की सूर्य प्रतिमाएं शामिल हैं। बरुआर गांव की द्वादश आदित्य प्रतिमा को इसकी दुर्लभता के कारण प्रमुखता से प्रस्तुत किया जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सभी प्रतिमाएं 100 से 2200 वर्ष पुरानी हैं और बिहार की सूर्य उपासना परंपरा को प्रस्तुत करती हैं। इस अभियान के तहत इंटैक द्वारा तीन पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है।
पहला सूर्य प्रतिमाओं पर आधारित, जिसे डा. शिवकुमार मिश्र द्वारा संग्रहित किया गया है। इनमें राज्य की 145 सूर्य प्रतिमाओं का विस्तृत प्रलेखन है।
दूसरा छठ लोकगीत, इसका संग्रह हृदय नारायण झा द्वारा किया गया है, जिसमें मैथिली, भोजपुरी, बज्जिका और मगही भाषाओं के 77 लोकगीतों का संग्रह है। तीसरा छठ पूजा पर केंद्रित है, इसका संपादन सौम्या आंचल, जिसमें देश-विदेश से प्राप्त 132 शोध पत्र शामिल हैं।
तैयार किया जा रहा डोजियर
तीनों पुस्तकें यूनेस्को को भेजे जाने वाले डोजियर का हिस्सा होंगी। इंटैक बिहार स्टेट के को-कन्वेनर डा. शिवकुमार मिश्र ने बताया कि छठ पर्व को यूनेस्को की विरासत सूची में शामिल करने के लिए डोजियर तैयार किया जा रहा है।
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सूची में शामिल होने से इस पर्व को वैश्विक पहचान और सम्मान मिलेगा, जिससे परंपरा का संरक्षण होगा और पर्यटन तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।
बिहार में सदियों से चली आ रही छठ परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति से जुड़ाव का पर्व है। इसमें अमीरी-गरीबी, जाति-धर्म का भेद मिट जाता है।
दूसरे प्रदेशों और विदेशों में रहने वाले बिहार के निवासी भी इसे श्रद्धा से मनाते हैं। यही कारण है कि इसे बिहार की मिट्टी, संस्कृति और एकजुटता की पहचान माना जाता है। यूनेस्को ने पहले ही छठ को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में डालने की सिफारिश की है।