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मधुबनी में मिथिला पेंटिंग और खादी का अद्भुत मेल, 10 करोड़ का कारोबार और सैकड़ों को रोजगार

Published: Thu, 03 Sep 2026 04:44 AM (IST)

Mukhyamantri Khadi Gramodyog Yojana: मधुबनी में मिथिला पेंटिंग और खादी का संगम आजीविका का नया आधार बन गया है, जिससे ...और पढ़ें

राजेश रंजन शशि, मधुबनी। Madhubani Khadi Mithila Painting: मिथिला की प्रसिद्ध लोक चित्रकला और खादी का संगम मधुबनी में आजीविका और व्यापार का नया आधार बन रहा है।

राजनगर प्रखंड के भगवानपुर ग्रामोदय सहयोग समिति में तैयार खादी वस्त्रों पर मिथिला पेंटिंग उकेरी जा रही है। इस अनूठे प्रयोग से संस्था का वार्षिक कारोबार 10 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।

सैकड़ों लोगों को रोजगार

इस पहल के जरिए ग्रामीण क्षेत्र के 400 से 450 लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से नियमित रोजगार पा रहे हैं। यहां काम करने वाले कारीगरों व कलाकारों की मासिक आय छह हजार से लेकर 20 हजार रुपये तक है।

स्थानीय स्तर पर पारंपरिक हुनर को आमदनी का मजबूत साधन बनाने से ग्रामीणों का पलायन भी थमा है।

दो एकड़ में परिसर

करीब दो एकड़ क्षेत्रफल में फैली इस संस्था में खादी निर्माण की पूरी श्रृंखला एक साथ संचालित की जाती है। परिसर के भीतर ही सूत की कताई, बुनाई, कपड़ों की रंगाई और आधुनिक सिलाई का काम व्यवस्थित रूप से होता है।

इसके बाद स्थानीय महिला कलाकार अपने बारीक हुनर से वस्त्रों पर खूबसूरत मिथिला पेंटिंग तैयार करती हैं।

कई हाथों का हुनर

खादी का एक तैयार परिधान बाजार में उतरने से पहले दर्जनों कुशल हाथों से होकर गुजरता है। कताई और बुनाई से लेकर सिलाई तक हर चरण में स्थानीय कामगार अपनी सेवाएं देते हैं।

अंत में मिथिला पेंटिंग के जुड़ते ही सामान्य खादी का वस्त्र एक विशिष्ट और बहुमूल्य ब्रांड में तब्दील हो जाता है।

खादी मॉल में आपूर्ति

संस्था के सचिव मो. अब्दूर राजिक रेजा ने बताया कि तैयार कुल उत्पादों का 80 प्रतिशत हिस्सा पटना और मुजफ्फरपुर के खादी मॉल भेजा जाता है। इसके अलावा केरल, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के 25 से 30 प्रमुख शहरों में इन कपड़ों की भारी मांग है।

संस्था देश भर में आयोजित होने वाले बड़े खादी मेलों और प्रदर्शनियों में भी अपने स्टॉल लगाकर सीधी बिक्री करती है।

सरकारी योजना का संबल

सचिव के अनुसार मुख्यमंत्री खादी एवं ग्रामोद्योग योजना के तहत मिली वित्तीय व तकनीकी सहायता ने उत्पादन का दायरा काफी बढ़ा दिया है। सरकारी प्रोत्साहन मिलने से उत्पादन क्षमता, रोजगार सृजन और व्यापक बाजार तक पहुंच में उल्लेखनीय तेजी आई है।

तमाम खर्च और आमदनी को मिलाकर संस्था आज 10 करोड़ रुपये के सालाना टर्नओवर के साथ आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रही है।