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अंगूठे के निशान से कलम थामने तक का सफर, मुंगेर की रीना ने अक्षर ज्ञान सीखकर ऐसे तोड़ी निरक्षरता की बेड़ियां

Published: Tue, 06 Oct 2026 08:26 AM (IST)

मुंगेर की 38 वर्षीय रीना देवी ने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों और गरीबी के बावजूद निरक्षरता की बेड़ियां तोड़ीं, बच्चों से सीखकर साक्षर बनीं और दूसरों पर निर्भरता खत्म की।

धरहरा प्रखंड का घटवारी गांव की महिलाओं को अक्षर ज्ञान सिखातीं (बाएं) से दूसरे रीना देवी . जागरण

धरहरा प्रखंड का घटवारी गांव की महिलाओं को अक्षर ज्ञान सिखातीं (बाएं) से दूसरे रीना देवी . जागरण

HighLights

  1. 38 साल की रीना देवी ने खुद सीखा पढ़ना-लिखना।

  2. बच्चों से पूछकर अक्षरों को पहचानना शुरू किया।

  3. अब दूसरों को भी पढ़ाई के लिए प्रेरित कर रही हैं।

शशिकांत, धरहरा (मुंगेर)। जिंदगी के 38 बसंत गुजर गए। घर-परिवार की जिम्मेदारियां निभाती रहीं, लेकिन अक्षरों से रिश्ता नहीं बन पाया। बैंक में काम हो या किसी कागज की जानकारी समझनी हो, मोबाइल पर आया संदेश हो या किसी जरूरी सूचना को पढ़ना—हर जगह दूसरों का सहारा लेना पड़ता था।

अपने ही जरूरी कामों के लिए किसी और पर निर्भरता धीरे-धीरे भीतर खलने लगी। फिर एक दिन रीना देवी ने तय किया कि अब उम्र पढ़ाई की राह में बाधा नहीं बनेगी। उन्होंने कलम थामी और घर को ही अपनी पाठशाला बना लिया।

धरहरा प्रखंड का घटवारी गांव कभी नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जाता था। इसी गांव की रहने वाली रीना देवी ने उम्र के एक पड़ाव पर अक्षरों से दोस्ती की। न कोई औपचारिक कक्षा, न कोई शिक्षक और न ही पढ़ाई का विशेष इंतजाम।

बच्चों से पूछ-पूछकर उन्होंने अक्षरों को पहचानना शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। उम्र के इस पड़ाव पर क, ख, ग को याद करना और फिर उन्हें जोड़कर शब्द बनाना उन्हें कठिन लगता था। कई बार गलतियां हुईं, झिझक भी हुई, लेकिन भीतर कुछ कर गुजरने की इच्छा हर बार भारी पड़ी।

जब पहली बार लिखा अपना नाम, चेहरे पर छा गई खुशी  

सीखने का वह दिन रीना देवी आज भी नहीं भूलतीं, जब उन्होंने पहली बार अपने हाथों से ‘रीना’ लिखा। कागज पर लिखे उन अक्षरों को देखकर उनके चेहरे पर जो खुशी आई, वह किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं थी। उनके लिए यह सिर्फ नाम लिख देना नहीं था।

Munger Reena Devi 38 Self Taught Literacy Inspires Others (1)

  • मुंगेर जिले के धरहरा प्रखंड अंतर्गत कभी नक्सल प्रभावित रहे घटवारी गांव निवासी 38 वर्षीय रीना देवी की प्रेरणादायक कहानी

  • पारिवारिक जिम्मेदारियों और गरीबी के कारण बचपन में पढ़ाई से वंचित रहीं, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर खुद कलम थामकर बनीं साक्षर

  • बच्चों से पूछ-पूछकर सीखी अक्षर पहचान; बैंक के काम से लेकर मोबाइल संदेश पढ़ने तक दूसरों पर निर्भरता पूरी तरह की खत्म

  • खुद साक्षर होने के बाद अब घर के पोते-पोतियों और गांव की बच्चियों को पढ़ाई के लिए कर रहीं प्रेरित, बांट रहीं अक्षर ज्ञान

यह उस निर्भरता के खिलाफ पहला कदम था, जिसने वर्षों तक उन्हें दूसरों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर किया था। धीरे-धीरे अक्षर शब्द बनने लगे और शब्द अर्थ देने लगे। अब वह पहले की तरह हर छोटी जानकारी के लिए दूसरों को नहीं खोजतीं।

मोबाइल पर आया संदेश हो या कोई जरूरी कागज, वह उसे खुद समझने की कोशिश करती हैं। बैंक के काम में अंगूठा लगाने वाली रीना के भीतर अब अपने काम को खुद समझने और करने का भरोसा आया है।

अब खुद सीखती हैं, दूसरों को भी पढ़ने-लिखने के लिए कर रहीं प्रेरित  

अक्षर ज्ञान हासिल करने के बाद रीना देवी की भूमिका यहीं खत्म नहीं हुई। वह अब अपने पोता-पोती और नाती-नतिनों को पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। आसपास की बच्चियों को भी अपने पास बुलाकर अक्षरों से परिचित कराने की कोशिश करती हैं।

जिस उम्र में कई लोग मान लेते हैं कि अब नया सीखना संभव नहीं, उसी उम्र में रीना देवी ने सीखकर साबित किया कि शिक्षा की कोई अंतिम उम्र नहीं होती। कभी जिन्हें किसी कागज का मतलब जानने के लिए दूसरे का इंतजार करना पड़ता था, आज वही दूसरे बच्चों को किताब खोलने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

एक रीना की कहानी, गांव के कई अधूरे अक्षर ज्ञान को दे रही नई उम्मीद  

आदिवासी बहुल घटवारी और आसपास के गांवों में रीना देवी जैसी कई महिलाएं और पुरुष हैं, जिनका जीवन अक्षर ज्ञान से दूर रहा। गरीबी, सामाजिक परिस्थितियां और शिक्षा तक सीमित पहुंच के कारण बचपन में स्कूल नहीं जा सके।

उम्र बढ़ती गई और जिम्मेदारियां बढ़ती गईं। लेकिन रीना देवी की कहानी अब उन्हें भी यह भरोसा देती है कि सीखने की शुरुआत के लिए देर जैसी कोई चीज नहीं होती।

कलम से सिर्फ अक्षर नहीं, गांव की महिलाओं के लिए उम्मीद की नई इबारत लिख रहीं रीना 

रीना देवी का सफर बताता है कि अक्षर ज्ञान केवल पढ़ना-लिखना सीखना नहीं है। यह अपने जरूरी काम खुद समझने, दूसरों पर निर्भरता कम करने और अपने भीतर वह आत्मविश्वास वापस पाने का नाम है, जो वर्षों की निरक्षरता में कहीं खो गया था।

कभी कागज पर अंगूठे की छाप छोड़ने वाली रीना देवी ने अब कलम पकड़ ली है। उनके हाथ में थमी कलम सिर्फ अक्षर नहीं लिख रही, बल्कि गांव की उन महिलाओं के लिए उम्मीद भी लिख रही है, जो आज भी मानती हैं कि पढ़ने-लिखने की उम्र निकल चुकी है।

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