Watch Video : गोरैया की चहचहाहट से गूंजा मुंगेर का गांव, विदेशी पर्यटक भी देख रहे बिहार का जीवंत संरक्षण चमत्कार
मुंगेर का शिवकुंड गांव गोरैया संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण बन गया है। ग्रामीणों के 11 साल के अथक प्रयासों से गोरैया की संख्या 50 से बढ़कर लगभग 500 हो गई ...और पढ़ें
HighLights
ग्रामीणों के 11 साल के प्रयास से गोरैया संरक्षण।
गोरैया की संख्या 50 से बढ़कर 500 हुई।
मुंगेर के शिवकुंड गांव बना विदेशी पर्यटकों और विशेषज्ञों का केंद्र।
संवाद सूत्र, हेमजापुर (मुंगेर)। कभी सामान्य सा दिखने वाला धरहरा प्रखंड का शिवकुंड गांव आज अपनी अनोखी पहचान के कारण चर्चा में है। यहां सुबह की शुरुआत गोरैया की मधुर चहचहाहट से होती है, जो अब सिर्फ ग्रामीणों ही नहीं बल्कि विदेशी मेहमानों को भी आकर्षित कर रही है। नन्हीं गोरैया की मौजूदगी ने इस गांव को खास बना दिया है।
ग्रामीणों ने मिलकर पेड़-पौधे लगाए, घोंसलों की व्यवस्था की और रासायनिक दवाओं के उपयोग को कम किया। इसके परिणामस्वरूप गौरैया ने यहां फिर से अपना बसेरा बना लिया। अब यह गांव प्रकृति प्रेमियों और पक्षी विशेषज्ञों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। विदेशी पर्यटक भी यहां पहुंचकर गोरैया संरक्षण के इस अनोखे प्रयास को देख रहे हैं और इसकी सराहना कर रहे हैं।
11 वर्ष पहले शुरू हुई मुहिम, संख्या में वृद्धि
गोरैया को बिहार का राजकीय पक्षी माना जाता है। शिवकुंड में 11 वर्ष पहले गोरैया संरक्षण की शुरुआत की गई। स्थानीय निवासी नीतीश कुमार, अनिल कुमार और सचिन कुमार सहित कुछ ग्रामीणों ने इस दिशा में पहल शुरू की। गंगा तट का किनारा और आसपास खेत-खलिहान में फैले अनाज की वजह से गोरैया ने यहां अपना डेरा डालना शुरू किया।
स्थानीय लोगों ने लगभग 130 घरों में गोरैया के लिए कृत्रिम घोंसले बनाए। इन घोंसलों में उन्हें भोजन और पानी की व्यवस्था भी की गई। धीरे-धीरे गोरैया की संख्या बढ़ी और अब अनुमानित संख्या लगभग 500 तक पहुंच गई है। शुरुआती दौर में उनकी संख्या सिर्फ 50 से 80 के आसपास थी। अब ये पक्षी शिवकुंड के अलावा सिंघिया, हेमजापुर, सुंदरपुर और बाहाचौकी गांवों में भी दिखाई देने लगे हैं।
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विदेशी पर्यावरण विशेषज्ञ हुए प्रभावित
शिवकुंड में हो रहे पर्यावरण संरक्षण के कार्यों को देखते हुए मुंगेर के लाल दरवाजा निवासी अभिमन्यु सिंह ने अपने पुत्र आरव सिंह को जानकारी दी, जो अमेरिका में पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत हैं। इसके बाद आरव ने इंडोनेशिया, बेंगलुरु, हरियाणा और अन्य संस्थाओं से संपर्क किया और गांव में हो रही पहल की सराहना कर उन्हें गोद लेने का प्रस्ताव दिया।
पिछले दिनों ही कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पर्यावरण संस्थाओं ने गांव का दौरा किया और संरक्षण के प्रयासों की प्रशंसा की। अब इस गांव को गोद लेकर इसे और विकसित करने की योजना पर विचार किया जा रहा है। प्रत्येक ग्रामीण इस मुहिम में सक्रिय भागीदारी निभा रहा है।

ग्रामीणों का संयुक्त प्रयास
स्थानीय लोग बताते हैं कि सभी मिलकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम कर रहे हैं। महिलाओं को अभी जागरूक किया जा रहा है ताकि वे भी इस पहल में योगदान दें। सामूहिक प्रयासों की वजह से गोरैया संरक्षण की यह मुहिम कामयाब हो रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि आने वाले समय में यहां गौरैया अध्ययन केंद्र स्थापित किया जाएगा, जो पर्यावरण शिक्षा और संरक्षण की दिशा में एक मिसाल बनेगा। इस पहल से न केवल गोरैया के संरक्षण में मदद मिली है, बल्कि आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र को भी संतुलित रखा जा रहा है।
प्रकृति और पर्यटन को मिली नई पहचान
शिवकुंड गांव अब सिर्फ गोरैया संरक्षण के लिए ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक पर्यटन के लिए भी जाना जाने लगा है। विदेशी पर्यटक गोरैया की चहचहाहट के बीच गांव की सैर करते हैं, स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली का अनुभव लेते हैं। इस पहल से गांव की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में भी सुधार की उम्मीद जगी है।
स्थानीय लोग कहते हैं कि यह पहल केवल पक्षियों को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन के लिए भी अहम कदम है। यह मॉडल बिहार के अन्य गांवों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है।
शिवकुंड गांव की कहानी बताती है कि स्थानीय समुदाय के संयुक्त प्रयास और सही दिशा-निर्देश से कैसे पारिस्थितिकी संरक्षण और प्राकृतिक पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है। गोरैया संरक्षण की यह मुहिम अब बिहार के लिए एक मिसाल बन चुकी है।