मकर संक्रांति 2026: कब है खिचड़ी पर्व, जानें शुभ मुहूर्त, दान-पुण्य और पूजा विधि
Bihar Khichdi Parv 2026: मकर संक्रांति 2026 की तिथि को लेकर हर वर्ष संशय की स्थिति बनती है और इस ...और पढ़ें

Makar Sankranti Shubh Muhurat: इस दिन गुजरात में पतंगबाजी का विशेष महत्व है। फाइल फोटो
HighLights
मकर संक्रांति 2026 का पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा।
सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे, उत्तरायण की शुरुआत होगी।
स्नान, दान और सूर्य पूजा का विशेष महत्व है।
अमरेंद्र तिवारी, मुजफ्फरपुर। Makar Sankranti 2026 Date: मकर संक्रांति भारत के उन चुनिंदा त्योहारों में शामिल है जिसे लोग स्थानीय महत्व और नाम के अनुरूप मनाते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां यह खिचड़ी के नाम से जानी जाती है। पंजाब का लोहड़ी तो विश्व प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में यह पोंगल के नाम से मनाई जाती है।
स्वरूप की वजह से अनूठा
गुजरात में इसे उत्तरायण कहते हैं। खानपान, खेलकूद और आध्यात्म तीनों का इसमें विशेष महत्व होने की वजह से मकर संक्रांति एक अनूठा पर्व बन जाता है। बिहार में जहां इसकी पहचान दही-चूड़ा, तिलकुट और लाई से है तो गुजरात में पतंगबाजी से। लोहड़ी और पोंगल की विशेष परंपरा रही है।
मकर संक्रांति की तिथि और संशय
इस वर्ष मकर संक्रांति का पुनीत पर्व 15 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। 14 जनवरी के रात्रि 9.19 बजे सूर्य का मकर(उत्तरायण )में आगमन होगा। 14 जनवरी को षष्टतिला एकादशी भी है। एकादशी को चावल और तिल प्रयोग वर्जित होता है।
अतः 15 जनवरी 2026 को मकर संक्रांति मनाना फलदायी होगा। इसको लेकर जिले के प्रमुख आध्यात्मिक गुरु, आचार्य पुरोहितों ने आपसी बातचीत कर कहा कि 15 तारीख को ही मकर संक्रांति शुभ है। उदयातिथि के अनुसार भी यह 15 जनवरी को पड़ रहा है।
इसकी जानकारी देते हुए आध्यात्मिक गुरु पंडित कमलापति त्रिपाठी ने बताया कि मकर संक्रांति को लेकर समस्त विद्वानों की सहमति है। बताया कि गरीबनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी पं विनय पाठक, प्रमुख आचार्य पं सुनेता तिवारी, पं नथुनी तिवारी, पं ब्रजेंद्र ओझा,पं धीरज झा धर्मेश,पं अभिनय, पाठक पं प्रभात मिश्रा,आर्ष विद्यापीठ, पं सुशील पांडेय,पं मदन मोहन शास्त्री,पं अभिनव पाठक,पं दिवाकर उपाध्याय, पं जयकिशोर मिश्र, पं धर्मेंद्र तिवारी, पं सुनील पांडेय, पं सुनील मिश्र, पं संतोष मिश्र , पं जयशंकर तिवारी, पं संजय तिवारी, पं हरिशंकर पाठक,पं विनोद कुमार मिश्र, पं संजय कुमार मिश्र, पं सुमन पाण्डेय,पं शत्रुघ्न ओझा आदि ने अपनी सहमति दी है। उसके अनुसार ही स्नान और दान किया जाना है। पुण्यकाल में इसका विशेष महत्व बताया गया है।
अध्यात्मिक महत्व
मकर संक्रांति के दिन ही सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। सूर्य उत्तरायण होते हैं। मकर संक्रांति पूरे भारत और नेपाल में भिन्न रूपों में मनाया जाता है। इस दिन प्रत्यक्ष देव सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करते हैं।
तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में जाना जाता हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। बिहार के कुछ जिलों में यह पर्व तिला संक्रांत नाम से भी प्रसिद्ध है।
मकर संक्रान्ति पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायण भी कहते हैं। 14 जनवरी के बाद से सूर्य उत्तर दिशा की ओर अग्रसर (जाता हुआ) होता है। इसी कारण इस पर्व को 'उतरायण' (सूर्य उत्तर की ओर) भी कहते है। वैज्ञानिक तौर पर इसका मुख्य कारण पृथ्वी का निरंतर 6 महीनों के समय अवधि के उपरांत उत्तर से दक्षिण की ओर वलन कर लेना होता है। और यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।
मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश, भीष्म पितामह द्वारा प्राण त्याग, भगवान विष्णु की असुरों पर विजय और गंगा के सागर से मिलन से जुड़ा है। जो अंधकार से प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
इस दिन उत्तरायण शुरू होता है, जो मोक्षदायक माना जाता है। इस दिन दान-स्नान का विशेष पुण्य होता है, जिससे शुभ कार्यों की शुरुआत होती है, जैसे विवाह, यज्ञ ,गृहप्रवेश ,गृहारंभ आदि शुभ कार्य और खरमास की समाप्ति के साथ हो जाते हैं।
मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनिदेव से मिलने उनके घर (मकर राशि) जाते हैं, जो पिता-पुत्र के प्रेम और सद्भाव का प्रतीक है।
एक कथा के अनुसार, शनि देव के पास तिल के अलावा कुछ नहीं था, तो उन्होंने तिल से सूर्य पूजा की, जिससे प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें आशीर्वाद दिया, और तभी से तिल का महत्व बढ़ा।
महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने बाणों की शैया पर रहते हुए अपने प्राण त्यागने के लिए मकर संक्रांति (उत्तरायण) का इंतजार किया, क्योंकि इस अवधि में देह त्यागने से मोक्ष मिलता है।
विष्णु पुराण के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने असुरों का संहार कर उनके सिर मंदार पर्वत पर गाड़ दिए थे, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। पौराणिक कथा है कि मकर संक्रांति पर ही गंगा नदी भगीरथ के पीछे कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में मिली थी, जिससे भगीरथ के पूर्वजों को मुक्ति मिली।
मकर संक्रांति से देवताओं का दिन शुरू होता है। यह जो खरमास के बाद आता है और यह समय शुभ कार्यों, दान और तपस्या के लिए बहुत फलदायी माना जाता है। जिससे सकारात्मकता बढ़ती है।
इसका विशेष महत्व
मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन ही प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य का प्रवेश मकर राशि में होता है। यह पिता-पुत्र के संबंधों में सुधार का प्रतीक है। माना जाता है कि इसके प्रभाव से कटुता खत्म हो जाती और मधुरता आती है।
इस दिन से सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण होना आरंभ होते हैं। तात्पर्य यह कि यह मौसम में बदलाव का संकेत भी होता है। कंपाने वाली ठंड के अंत की शुरुआत मकर संक्रांति वाले दिन से ही होती है। उसके बाद धीरे-धीरे मौसम में भी इसका प्रभाव झलकने लगता है। वसंत का आगमन हो जाता है।
खरमास खत्म होने के बाद शुभ कार्य की शुरुआत होती है। हालांकि इस बार स्थिति थोड़ी अलग है। शुक्र के अस्त होने की वजह से शुभ कार्य यानी शादी-विवाह व अन्य मांगलिक कार्य के शुरू होने के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा।
पूजा विधि
- स्नान: मकर संक्रांति में स्नान महत्वपूर्ण है। संभव हो तो गंगा में या फिर किसी भी पवित्र जलाशय में शुभ समय में जरूर करें।
- अर्घ्य: स्नान के बाद भगवान सूर्य को जल अर्पित करें। इसके लिए तांबे के लोटे में जल, लाल फूल, अक्षत, काले तिल को डालने के बाद 'ॐ सूर्याय नम:' मंत्र का उच्चारण करें।
- पूजन: इस दिन भगवान विष्णु और सूर्य देव की पूजा करें। उन्हें तिल और गुड़ का भोग अवश्य लगाएं।
- भोजन: बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस दिन दही-चूड़ा,तिलकुट और खिचड़ी खाने की परंपरा है।
दान जरूर करें
जिस तरह से मकर संक्रांति में स्नान का विशेष महत्व है। उसी तरह से दान का भी खास स्थान है। ग्रंथों में इसकी महिमा का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। कहा गया है कि मकर संक्रांति के दिन जो दान किया जाता है उसका फल अक्षय यानी कभी नष्ट नहीं होने वाला होता है। ये दान करें-
- तिल और गुड़: शनि और सूर्य की कृपा के लिए।
- खिचड़ी: चावल, उड़द दाल, नमक और हल्दी का दान।
- गर्म कपड़े: जरूरतमंदों को कंबल या ऊनी कपड़े देना बहुत शुभ होता है।
- अनाज: नया चावल या गेहूं दान करना समृद्धि लाता है।
मकर संक्रांति के फायदे
इस अवसर पर किए जाने वाले स्नान और दान का विशेष धार्मिक महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन किए गए दान के फल से पाप का नाश हो जाता है। सूर्य की स्थिति में बदलाव का प्रभाव भी लोगों पर सकारात्मक रूप से देखने को मिलता है। सभी प्रकार के संबंध में मधुरता आती है। व्यापार में लाभ होता है। इतना ही नहीं, इस दिन तिल और गुड़ खाने की परंपरा है। यह शरीर को ठंड से लड़ने की क्षमता देता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
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