बिहार में विकास परियोजनाओं के मुआवजा भुगतान में देरी पर मुख्यालय की सीधी निगरानी
Land Acquisition Compensation: बिहार में विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण और मुआवजा भुगतान में देरी पर अब मुख्यालय स्तर से कड़ी निगरानी रखी जाएगी ...और पढ़ें

इस खबर में प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
बाबुल दीप, मुजफ्फरपुर। Bihar Infrastructure: राज्य में चल रही बड़ी परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण और मुआवजा भुगतान में हो रही देरी को लेकर अब सख्ती बरती जाएगी। भू-अर्जन निदेशालय ने फैसला लिया है कि रैयतों को दिए जाने वाले मुआवजा भुगतान की सीधी निगरानी अब मुख्यालय स्तर से की जाएगी।
इस कदम का उद्देश्य परियोजनाओं को समय पर पूरा करना और लागत बढ़ने से रोकना है।
साप्ताहिक रिपोर्ट देना अनिवार्य
निदेशालय ने सभी जिला भू-अर्जन पदाधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे हर सप्ताह मुआवजा भुगतान से जुड़ी रिपोर्ट मुख्यालय को भेजें। इसके लिए एक निर्धारित फॉर्मेट भी जारी किया गया है, जिसे भरकर पोर्टल पर अपलोड करना होगा।
रिपोर्ट में परियोजना का नाम, प्राप्त राशि, आवेदन की संख्या, भुगतान पाने वाले रैयतों की संख्या, वितरित राशि और लंबित मामलों का पूरा विवरण देना होगा।
देरी से बढ़ रही लागत
अधिकारियों के अनुसार, मुआवजा भुगतान में लेटलतीफी के कारण कई परियोजनाएं वर्षों तक लटकी रहती हैं। इससे न केवल लागत बढ़ती है, बल्कि सरकार को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है।
उच्चस्तरीय समीक्षा भी जारी
भूमि अधिग्रहण और मुआवजा भुगतान प्रक्रिया की उच्चस्तरीय समीक्षा की जा रही है। इसमें यह पता लगाया जा रहा है कि देरी किन कारणों से हो रही है।
तकनीकी अड़चन होने पर विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी, जबकि कोर्ट से जुड़े मामलों में मुख्यालय स्तर से त्वरित पहल की जाएगी, ताकि प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके।
जहां देरी बनी समस्या
मुजफ्फरपुर-हाजीपुर बाइपास
करीब 17 किलोमीटर लंबे इस बाइपास को 2010 में मंजूरी मिली थी। 2013 में रैयतों के कोर्ट जाने के कारण काम रुक गया। 2021 में दोबारा काम शुरू हुआ और अब जाकर चालू हो सका। शुरुआती लागत 200 करोड़ थी, जो देरी के कारण करीब 300 करोड़ तक पहुंच गई।
चंदवारा पुल
2015 में स्वीकृत इस पुल का निर्माण 2018 में पूरा हो गया, लेकिन मुआवजा विवाद के कारण एप्रोच पथ नहीं बन सका। करीब 40 करोड़ की परियोजना में अधिग्रहण व भुगतान पर 58 करोड़ खर्च हो चुके हैं, फिर भी काम अधूरा है।
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मानिकपुर-साहेबगंज फोरलेन
करीब 800 करोड़ रुपये की इस परियोजना की लागत बढ़कर 1000 करोड़ के पार पहुंच चुकी है। मुआवजा भुगतान और अन्य प्रक्रियाओं में देरी के कारण निर्माण कार्य अभी भी जारी है।
मझौली-चोरौत एनएच 527 सी
यह परियोजना भी चार-पांच साल से देरी का शिकार है। भूमि अधिग्रहण, अतिक्रमण हटाने और धार्मिक स्थलों के स्थानांतरण में अड़चनें आईं। लागत में करीब 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ा है।
आमजन पर पड़ रहा असर
परियोजनाओं में देरी का सीधा असर आम लोगों पर पड़ रहा है। बेहतर सड़क और पुल सुविधा समय पर नहीं मिलने से लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है।
अब मुख्यालय स्तर पर निगरानी से उम्मीद जताई जा रही है कि मुआवजा भुगतान प्रक्रिया तेज होगी और परियोजनाएं तय समय पर पूरी हो सकेंगी।