Bihar News : हरेन सरकार व दिनेश चंद्र राय बन मुजफ्फरपुर आए थे खुदीराम और चाकी
खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने 1908 में मुजफ्फरपुर में बम विस्फोट कर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी थी। उनके बलिदान से जुड़े स्थल, जैसे पुरानी धर्मशाला ...और पढ़ें

यह तस्वीर जागरण आर्काइव से ली गई है।
HighLights
खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने 1908 में मुजफ्फरपुर में बम विस्फोट किया।
उनके बलिदान से जुड़े स्थल आज भी उपेक्षित और बदहाल हैं।
नगर आयुक्त ने इन ऐतिहासिक स्थलों के विकास की योजना बनाई है।
प्रेम शंकर मिश्रा, मुजफ्पुरपुर। देश के स्वतंत्रता संघर्ष में लाखों बलिदान दिए गए। इनमें तिरहुत की जमीन पर दो युवाओं का दिया गया बलिदान कुछ अलग है। यह इसलिए कि 30 अप्रैल 1908 को जिस उम्र में उन्होंने बम विस्फोट कर ब्रिटिश हुकूमत को बताया था कि आजादी का संघर्ष अब और तेज होगा, वह खेलने कूदने की थी।
यही कारण है कि अमर बलिदानी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी के बलिदान से जुड़े स्थल आज भी लोगों को रोमांचित करते हैं। दूसरी ओर इन स्थलों को जो गौरव मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। इन महत्वपूर्ण स्थलों मे एक हैं, मुजफ्फरपुर जंक्शन से सटा पुरानी धर्मशाला चौक।
खुदीराम और चाकी के अनछुए पहलुओं को कला केंद्र बिहार व पश्चिम बंगाल की ओर से रिसर्च किया गया। इसमें बिहार सरकार के अभिलेखागार निदेशालय व पश्चिम बंगाल अभिलेखागार से मदद ली गई।
इसपर शोध करने वाले सचिन चक्रवर्ती, प्रभारी पदाधिकारी, जिला अभिलेखागार, मुंगेर सह क्षेत्रीय अभिलेखागार, भागलपुर के अनुसार प्रेसीडेंसी कोर्ट आफ अलीपुर का चीफ मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड दमनकारी था।
मिदनापुर कॉलेजिएट स्कूल के शिक्षक रहे क्रांतिकारी हेमचंद्र कानूनगो ने उसकी हत्या की रणनीति तैयार की थी। पेरिस से बम बनाने कां प्रशिक्षण लेकर लौटे हेमचंद्र ने 'बुक बम' की योजना बनाई।
कोकोआ के खाली डिब्बे में पिकरिक एसिड व तीन डेटोनेटर रखकर उसे किताब का रूप दे दिया गया। इसे 'हर्बर्ट ब्रूम्स कॉमेंटरिज ऑफ कॉमन लॉ' नाम दिया गया।
परेश मल्लिक का नाम प्रेषक में लिख कर इसे किंग्सफोर्ड के पते पर भेज दिया गया। योजना थी कि जैसे ही वह पुस्तक खोलेगा, बम विस्फोट हो जाएगा। किंग्सफोर्ड ने पुस्तक आलमारी में रख दी, जिससे योजना सफल नहीं हो सकी।
मुजफ्फरपुर में भी सेवा देने वाले सचिन कहते हैं, इस बीच किंग्सफोर्ड को जिला जज बनाकर मुजफ्फरपुर भेज दिया गया। योजना बदलते हुए उसकी हत्या का जिम्मा खुदीराम व प्रफुल्ल चाकी को दिया गया।
हेमचंद्र ने दो बम, छह औंस डायनामाइट, एक डेटोनेटर और ब्लैक पाउडर फ्यूज देकर खुदीराम व चाकी को विदा किया। दोनों नाम बदलकर क्रमशः हरेन सरकार व दिनेश चंद्र राय के रूप में मुजफ्फरपुर पहुंचे। यहां वे आकर करीब एक सप्ताह रुके।
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धर्मशाला चौक पर वर्षों से चाय की दुकान चलाने वाले भाेला चौधरी कहते हैं, उनके पिता रघुनाथ चौधरी भी बलिदानी बोस और चाकी की कहानी सुनाते थे। उनका कहना था कि दोनों की पहचान के लोग यहां थे, मगर इसकी भनक पुलिस तक नहीं पहुंचे इसलिए परिचित के यहां नहीं ठहरे।
यह धर्मशाला निजी जमीन में था। रणवीर सोंधी इसके मालिक थे। उनके वंशजों ने इसे बेच दिया। इस स्थल से धर्मशाला का नामो-निशान मिट गया है।
अब यहां सिर्फ दुकानें हैं। एक छोटा सा हिस्सा धर्मशाला का बचा है। साथ ही वह कुआं भी है जहां दोनों बलिदानियों ने स्नान किया था। इस कुएं का भी जीर्णोद्धार नहीं हो सका। पूर्व मंत्री सुरेश कुमार शर्मा ने कुछ काम कराया, मगर इसकी अब भी जीर्ण-शीर्ण है।
बापू की छुआछूत आंदोलन से भी जुड़ा स्थल
भोला चाैधरी ने कहा, छुआछूत के खिलाफ महात्मा गांधी के आंदाेलन का भी यह स्थल गवाह है। बापू जब मुजफ्फरपुर आए तो उन्होंने यहां सभी समाज के लोगों को लेकर भोजन तैयार कराया।
दलित समुदाय के लोगों को नए वस्त्र पहनाकर भोजन को स्पर्श कराया गया। इसके बाद सभी समाज के लोगों ने इसे ग्रहण किया। दुर्भाग्य है कि स्वतंत्रता आंदोलन और एकरूप समाज के निर्माण से जुड़ा स्थल आज बदहाल है।
अमर बलिदानी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी से जुड़े स्थलों को विकसित किए जाने की योजना है। इसपर काम चर्चा हुई है। इसके बाद प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।
ऋतुराज प्रताप सिंह, नगर आयुक्त, मुजफ्फरपुर