बिहार के इस्लामपुर से रामनगरी का है गहरा नाता, इस नगर को कहा जाता है 'छोटी अयोध्या'
नालंदा का इस्लामपुर नगर 'छोटी अयोध्या' के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यह श्री लक्ष्मण किला, अयोध्या धाम के संस्थापक स्वामी युगलानन्य शरण जी महाराज की जन्मभूमि है।

HighLights
इस्लामपुर स्वामी युगलानन्य शरण महाराज की जन्मभूमि है।
इन्होंने अयोध्या में 'श्री लक्ष्मण किला' की स्थापना की थी।
स्वामी जी ने 92 विशिष्ट भक्ति ग्रंथों की रचना की।
संवाद सूत्र, इस्लामपुर। नालन्दा जिला के इस्लामपुर नगर का श्री अयोध्या धाम से एक विशेष ही लगाव रहा है, इस लगाव का मुख्य कारण देश के प्रथम रसिकाचार्य सह 'श्री लक्ष्मण किला' श्री अयोध्या धाम के संस्थापक अनन्य श्री स्वामी युगलानन्य शरण महाराज का यह जन्मभूमि रही है, इसी को ले श्री अवध में (श्री अयोध्या धाम) इस्लामपुर को छोटी अयोध्या के नाम से जाना जाता है।
जानकारों की मानें तो कार्तिक शुक्ल सप्तमी विक्रम संवत 1818 ई0 को स्वामी युगलानन्य शरण महाराज का जन्म नगर के राणा प्रताप नगर मोहल्ले में हुआ था।
वे जन्म से ही तेजस्वी व विलक्षण प्रतिभा के थे, इनके तेजस को देखते हुए मात्र आठ वर्ष की आयु में इनका यज्ञोपवित्र हुआ था। तेजस्वी रहने के कारण इनके पिता ने इनकी शिक्षा तत्कालीन प्रख्यात विद्वान पंडित हरिकृष्ण जी से कराया, गुरु की शिक्षा व उपदेश से प्रभावित होकर इनका मन उपासना के प्रति आकृष्ट हुआ।

स्वामी युगलानन्य शरण महाराज।
अपने पिता के अकेले संतान होने के कारण इन्होंने शिक्षा का बहाना बनाकर काशी की यात्रा किया फिर कुछ माह बाद छपरा स्थित गुरु जी के पास गये और छोटी उम्र से ही युगल उपासना की दीक्षा प्राप्त करते हुए चित्रकूट जाकर साधना में लग गये।
संतों की मानें तो अपनी कठिन साधना के प्रभाव से ये सीता-राम जी का प्रत्यक्ष दर्शन करते हुए उनका सानिध्य पाया और फिर अपने आराध्य का निर्देश पाकर श्री अयोध्या जी पहुंचे जहां इन्होंने 92 विशिष्ट भक्ति ग्रंथ की रचना किया।
इनके रचनाओं में श्री नाम कांति, धाम कांति, इश्ककांति, अवध महिमा, रघुवर गुड़ दर्पण सहित अन्य ग्रंथ शामिल हैं। बताया जाता है कि इनके द्वारा रचित ग्रंथो के आलेखों का आज भी संत लोग पाठ करते हैं।
स्वामी जी के अलौकिक तेजोमय व्यक्तित्व, विद्वत्ता और साधना से प्रभावित होकर तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी भी उनका बहुत आदर करते थे। तत्कालीन अंग्रेज सरकार द्वारा उन्हें सरयू तट पर भूमि ताम्रपत्र पर लिखकर समर्पित की गई थी।
रीवा के महाराज थे अनन्य भक्त
कहा जाता है कि रीवा राज्य के तात्कालिक नरेश महाराज रघुराज सिंह इनके अनन्य भक्तों में एक थे साथ ही उनके दीवान दीनबंधु पांडेय जी ने इनके न चाहते हुए भी श्री सरयू नदी के तट पर एक भव्य मंदिर एवं आश्रम का निर्माण कराया, जिसे आज 'श्री लक्ष्मण किला' (आचार्यपीठ) के नाम से जाना जाता है।
कहा जाता है कि माधुर्य भाव और अनन्य रामभक्ति का आलोक फैलाने के उपरांत 1877 ई0 में स्वामी जी ने अपना भौतिक शरीर त्यागकर साकेतधाम को प्रस्थान किया।
आज भी प्रतिवर्ष उनके जन्मदिन एवं पुण्यतिथि पर श्री अयोध्या स्थित श्री लक्ष्मण किला पीठ एवं इस्लामपुर स्थित श्री अयोध्या ठाकुरबाड़ी में साधु- संतों का जमावड़ा होता है, जहां उनके रचित साहित्य, सिद्धांतों और भक्ति मार्ग का स्मरण कर लोग उन्हें याद कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
