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    नालंदा विश्वविद्यालय: आधुनिक तकनीक और प्राचीन 'आहर-पाइन' का संगम, बना दुनिया का पहला नेट-जीरो आत्मनिर्भर परिसर

    Updated: Fri, 01 May 2026 05:27 AM (GMT+05:30)

    नालंदा विश्वविद्यालय ने ऊर्जा, जल और संसाधनों के कुशल प्रबंधन पर आधारित एक नेट-जीरो और आत्मनिर्भर हरित परिसर मॉडल प्रस्तुत किया है। यह मॉडल प्राचीन आह ...और पढ़ें

    नालंदा विश्वविद्यालय

    नालंदा विश्वविद्यालय

    HighLights

    1. नेट-जीरो और आत्मनिर्भर हरित परिसर का सशक्त मॉडल।

    2. प्राचीन आहर-पाइन प्रणाली का आधुनिक तकनीक से पुनरुद्धार।

    3. 100 एकड़ जल निकाय, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण।

    संवाद सहयोगी, राजगीर। नालंदा विश्वविद्यालय आज विश्व पटल पर एक ऐसे संस्थान के रूप में उभर रहा है, जिसने सतत विकास को व्यवहार में उतारते हुए नेट-जीरो एवं आत्मनिर्भर हरित परिसर का सशक्त मॉडल प्रस्तुत किया है। विश्वविद्यालय का यह मॉडल ऊर्जा, जल और संसाधनों के कुशल प्रबंधन पर आधारित है।

    जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी नालंदा मॉडल उल्लेखनीय है। लगभग 100 एकड़ में विकसित जल निकाय, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देते हैं। साथ ही आहर-पईन जैसी प्राचीन मगध परंपराओं को पुनर्जीवित कर आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा गया है। जिससे परिसर की जल आवश्यकताओं की पूर्ति और सूक्ष्म जलवायु संतुलन सुनिश्चित हो रहा है।

    जिसमें समूचे विश्वविद्यालय का परिसर अनेकों वाटर बॉडी यानी जल निकाय, जलाशय या जलस्रोत के बीचों बीच स्थित है। जिसका विहंगम दृश्य इस परिसर को जल संचय सह पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से अनोखा बनाता है। ऊर्जा, जल और पर्यावरण-तीनों में 'नेट-जीरो की झलक इसे वैश्विक स्तर पर सराहनीय विवि की काफी सराहना की जाती है।

     न केवल भारत के लिए, बल्कि विश्व के लिए भी प्रेरणादायक मार्गदर्शक

    इस बाबत विवि के कार्यपालक अभियंता (इलेक्ट्रिकल) सह नेट-जीरो एवं सतत् (सस्टेनेबल) कैम्पस विशेषज्ञ इंजीनियर मनोज कुमार ने बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय का नेट-जीरो परिसर आज एक जीवंत प्रयोगशाला के रूप में स्थापित हो चुका है। जहां का वर्षा कृषि सह जल संचयन पर्यावरण संरक्षण, तकनीकी नवाचार और सामाजिक सहभागिता का समन्वय देखने को मिलता है। यह मॉडल न केवल भारत के लिए, बल्कि विश्व के लिए भी एक प्रेरणादायक मार्गदर्शक बनता जा रहा है।

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    उन्होंने बताया कि विवि के आधारभूत संरचनाओं सह भवनों को इस तरह से डिजाइन किया गया है, कि वर्षा का पानी विवि के विशालकाय आधारभूत संरचनाओं के भवनों के छत से नीचे ड्रेनेज सिस्टम से सीधे परिसर के जल निकायों में समा जाता है। जो वर्ष भर काम आता है।

    यह परिसर एक नेट जीरो ग्रीन मॉडल है। जो सौर संयंत्रों, घरेलू और पेयजल उपचार संयंत्रों, एक जल पुनर्चक्रण संयंत्र, 100 एकड़ जल निकायों और कई अन्य पर्यावरण-अनुकूल सुविधाओं के साथ आत्मनिर्भर है।

    डिसेंट्रलाइज्ड वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट सिस्टम काफी संख्या में लगाए 

    पानी की रीसाइक्लिंग और दोबारा इस्तेमाल में ऑपरेशनल फेज के दौरान सीवेज को ट्रीट करने के लिए डिसेंट्रलाइज्ड वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट सिस्टम काफी संख्या में लगाए गए हैं। और ट्रीट किए गए पानी का पूरी तरह से ज़मीन की सिंचाई के लिए दोबारा इस्तेमाल किया जाएगा।

    जिसका फार्मूला रेन-वॉटर हार्वेस्टिंग, आहर और पाइन, परकोलेशन के जरिए ग्राउंड वॉटर रिचार्ज, घरेलू-लो फ्लो फिक्स्चर, एक्वेटिक ट्रीटमेंट के जरिए पानी की रीसाइक्लिंग व फ्लशिंग और सिंचाई-रीसाइकिल किए गए पानी का इस्तेमाल पर आधारित है।

     4.5 किलोमीटर लंबे स्टॉर्म वॉटर नेटवर्क 

    उन्होंने आगे बताया कि विवि का वर्षा जल संचयन एवं लर्निंग मॉडल है। नालन्दा विश्वविद्यालय परिसर में वर्षा जल संचयन को एक समग्र एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ अपनाया गया है। लगभग 100 एकड़ में विकसित आपस में जुड़े जल निकाय, 4.5 किलोमीटर लंबे स्टॉर्म वॉटर नेटवर्क तथा पारंपरिक आहर-पाइन प्रणाली के पुनर्जीवन के माध्यम से वर्षा जल का अधिकतम संग्रहण, संचयन एवं भूजल पुनर्भरण सुनिश्चित किया जा रहा है। 

    यह मॉडल न केवल बाढ़ एवं सूखे जैसी परिस्थितियों में लचीलापन प्रदान करता है, बल्कि इसे एक लिविंग लर्निंग मॉडल के रूप में भी विकसित किया गया है। जहाँ छात्र, शोधकर्ता एवं नीति-निर्माता पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक जल प्रबंधन तकनीकों के समन्वय को व्यवहारिक रूप में समझते हैं।

    तीन प्रमुख जल प्रणालियां संचालित

    नालन्दा विश्वविद्यालय परिसर में जल प्रबंधन के लिए प्राचीन आहर–पाइन प्रणाली को आधुनिक तकनीक के साथ समन्वित करते हुए एक स्वदेशी जल नेटवर्क विकसित किया गया है। परिसर में लगभग 40 हेक्टेयर (100 एकड़) में जल निकायों का निर्माण कर वर्षा जल संचयन को प्रभावी बनाया गया है। यहां तीन प्रमुख जल प्रणालियां संचालित हैं—छतों से एकत्रित पेयजल, आहर–पाइन नेटवर्क के माध्यम से घरेलू उपयोग का जल, तथा पुनर्चक्रित अपशिष्ट जल जिसे कैनना इंडिका (वैजयन्ती) जैसे जलीय पौधों द्वारा उपचारित कर फ्लशिंग एवं सिंचाई में उपयोग किया जाता है।

    पेयजल के रूप में किया जाता है उपयोग 

    परिसर का संपूर्ण जल चक्र इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि वह बाढ़ एवं सूखे, दोनों परिस्थितियों के प्रति लचीला रहे। छतों से प्राप्त वर्षा जल को भूमिगत टैंकों में संग्रहित कर पेयजल के रूप में उपयोग किया जाता है। जबकि अतिरिक्त जल को कमल सागर केंद्रीय जलाशय एवं उससे जुड़े बैलेंसिंग टैंकों तक आहर–पाइन नेटवर्क के माध्यम से पहुंचाया जाता है। 

    आहरों में संचित जल का उपयोग सिंचाई एवं प्रायोगिक कृषि में किया जाता है। घरेलू अपशिष्ट जल का उपचार द्वारा कर लैंडस्केप सिंचाई में पुनः उपयोग किया जाता है। उल्लेखनीय है कि परिसर के विकास में पारंपरिक दृष्टिकोण अपनाते हुए भवन निर्माण से पूर्व जल निकायों का निर्माण किया गया। ताकि वर्षा जल का संचयन सुनिश्चित हो सके। जो सतत विकास का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। विश्वविद्यालय का यह मॉडल केवल परिसर तक सीमित नहीं है। स्थानीय समुदाय को स्वच्छ ऊर्जा, जल प्रबंधन और जैविक कृषि से जोड़ते हुए समावेशी विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है। 'सहभागिता' जैसे प्रयासों के माध्यम से विश्वविद्यालय और ग्रामीण समुदाय के बीच एक सशक्त साझेदारी विकसित हो रही है।