सोन का पानी किसका? बिहार को मिलेगा ज्यादा या झारखंड को बड़ा फायदा! 26 साल पुराने विवाद पर आज लगेगी मुहर
बिहार और झारखंड के बीच 26 साल पुराना सोन नदी जल बंटवारा विवाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता ...और पढ़ें

सोन नदी
HighLights
बिहार-झारखंड सोन नदी जल विवाद 26 साल बाद सुलझा।
इंद्रपुरी जलाशय परियोजना से दक्षिण बिहार को मिलेगा सिंचाई लाभ।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुआ समझौता।
डिजिटल डेस्क, पटना। Son River Water Sharing सोन नदी के पानी को लेकर बिहार और झारखंड के बीच करीब 26 साल से चला आ रहा विवाद अब खत्म होने की कगार पर है। दिल्ली के कर्तव्य भवन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में अहम बैठक हो रही है।
इसमें बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत दोनों राज्यों के वरिष्ठ नेता और अधिकारी मौजूद हैं। बैठक में सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर अंतिम समझौते पर मुहर लगने की उम्मीद है।
1973 में तय हुआ था हिसाब, तब झारखंड था बिहार का हिस्सा
सोन नदी के जल बंटवारे की जड़ करीब 53 साल पुरानी है। साल 1973 में बाणसागर परियोजना को लेकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अविभाजित बिहार के बीच समझौता हुआ था।
इस समझौते में संयुक्त बिहार के हिस्से में 7.75 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी आया था। उस समय झारखंड अलग राज्य नहीं था, इसलिए पूरा हिस्सा बिहार के नाम पर था।
लेकिन साल 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड नया राज्य बना और यहीं से पानी के बंटवारे का विवाद शुरू हो गया। झारखंड ने अपने हिस्से की मांग उठाई तो बिहार ने 1973 के समझौते का हवाला देते हुए अपने हिस्से पर दावा बनाए रखा।
झारखंड ने कहा- नदी का कैचमेंट हमारे यहां, हमें भी हिस्सा चाहिए
झारखंड का तर्क था कि सोन नदी का उद्गम और उसका बड़ा कैचमेंट क्षेत्र उसके इलाके में आता है, इसलिए जल बंटवारे में उसे भी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
दूसरी ओर, बिहार का कहना था कि 1973 के समझौते में संयुक्त बिहार के लिए 7.75 MAF पानी पहले ही निर्धारित किया जा चुका है।
विवाद इतना बढ़ा कि बिहार की महत्वाकांक्षी इंद्रपुरी जलाशय परियोजना भी अटक गई। परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए झारखंड की सहमति जरूरी थी, लेकिन पानी के सवाल पर दोनों राज्यों के बीच सहमति नहीं बन पाई।
2025 में पहली बड़ी पहल, रांची में निकला समाधान का रास्ता
लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाने की दिशा में बड़ी पहल 10 जुलाई 2025 को हुई। रांची में पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की 27वीं बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने की थी।
इसी बैठक में दोनों राज्यों के बीच सैद्धांतिक तौर पर 7.75 MAF पानी को बांटने पर सहमति बनी। इसके बाद बातचीत आगे बढ़ी और बिहार कैबिनेट ने 13 जनवरी 2026 को प्रस्तावित फॉर्मूले को मंजूरी दे दी।
अब सबसे बड़ा सवाल- बिहार को कितना, झारखंड को कितना?
ताजा प्रस्तावित फॉर्मूले के मुताबिक कुल 7.75 MAF पानी में से बिहार को करीब 5.57 MAF और झारखंड को करीब 2.00 MAF पानी मिलने की बात सामने आई है।
हालांकि, अलग-अलग रिकॉर्ड में झारखंड के हिस्से को लेकर 2.18 MAF तक के आंकड़े का भी उल्लेख मिलता रहा है।
यानी कुल हिस्से में बिहार का हिस्सा झारखंड से काफी ज्यादा रहने वाला है। अब आज की बैठक में अंतिम आंकड़ों और शर्तों पर औपचारिक सहमति बनने की उम्मीद है। इसके बाद दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद नए समझौते के साथ खत्म हो सकता है।
बिहार के लिए क्यों बड़ा है ये समझौता? इंद्रपुरी परियोजना पर टिकी नजर
इस समझौते का सबसे बड़ा असर दक्षिण बिहार पर पड़ने की उम्मीद है। सोन नदी को दक्षिण बिहार की लाइफलाइन माना जाता है। नदी मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलती है और झारखंड व उत्तर प्रदेश से होते हुए बिहार के मनेर के पास गंगा में मिलती है।
जल बंटवारे पर सहमति बनने से बिहार की इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकता है। यह परियोजना दशकों से अटकी हुई है और इसके पूरा होने पर दक्षिण बिहार के बड़े हिस्से में सिंचाई सुविधा को मजबूत करने की योजना है।
इंद्रपुरी परियोजना बनी तो इन जिलों के किसानों को मिलेगा फायदा
परियोजना का असर भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, पटना, गया और अरवल जैसे जिलों तक पहुंचने की उम्मीद है। इससे लाखों किसानों को सिंचाई सुविधा का लाभ मिल सकता है।
योजना के तहत दो लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन पर सिंचाई व्यवस्था बेहतर करने का लक्ष्य बताया जा रहा है। इसके अलावा पेयजल उपलब्धता और जल प्रबंधन को भी इससे फायदा होने की उम्मीद है।
सोन का पानी सिर्फ खेती नहीं, दक्षिण बिहार की कई जरूरतों से जुड़ा
सोन नदी दक्षिण बिहार के लिए सिर्फ सिंचाई का स्रोत नहीं है। खेती, पेयजल और जल प्रबंधन के लिहाज से भी इसका महत्व काफी ज्यादा है। पानी के बंटवारे को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनने से भविष्य की सिंचाई और जल प्रबंधन योजनाओं को भी गति मिल सकती है।
अब सबकी नजर दिल्ली की इस बैठक पर है। अगर आज अंतिम समझौते पर मुहर लगती है, तो 26 साल पुराना बिहार-झारखंड सोन जल विवाद इतिहास बन सकता है और दक्षिण बिहार की बहुप्रतीक्षित इंद्रपुरी परियोजना के लिए भी नई उम्मीद पैदा हो सकती है।
