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एंटीबायोटिक दुरुपयोग से सुपरबग का बढ़ रहा खतरा, WHO 2025 रिपोर्ट में 6 बैक्टीरिया पर सामान्य दवाएं निष्प्रभावी

Updated: Wed, 18 Feb 2026 04:21 AM (IST)

एंटीबायोटिक के गलत इस्तेमाल से बैक्टीरिया तेजी से सुपरबग बन रहे हैं, जिससे जीवनरक्षक दवाएं निष्प्रभावी हो रही हैं। डब्ल्यूएचओ ...और पढ़ें

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संक्षेप में पढ़ें

पवन कुमार मिश्र, पटना। जीवनरक्षक एंटीबायोटिक दवाएं, जागरूकता की कमी के कारण तेजी से निष्प्रभावी हो रही हैं। पहले जो रोग सामान्य एंटीबायोटिक से ठीक हो जाते थे अब उसके लिए हाईडोज वाली नई दवाएं देनी पड़ रही हैं। कारण, एंटीबायोटिक इस्तेमाल से लेकर उसके निस्तारण तक में व्याप्त लापरवाही है, जिससे रोगकारक बैक्टीरिया तेजी से सुपरबग बन रहे हैं।

2025 की डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार छह बैक्टीरियल संक्रमण के इलाज पर अब सामान्य एंटीबायोटिक निष्प्रभावी हो चुके हैं तो 2024 की भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) की रिपोर्ट के अनुसार देश में 83 प्रतिशत रोगियों में मल्टी ड्रग रजिस्टेंस यानी उनमें कई दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है। इसके बाद हाल में खुद प्रधानमंत्री ने इस मौन महामारी से बचने की अपील की है।

दवा निष्प्रभावी होने के प्रमुख कारण

आइजीआइएमएस में फार्माकोलाजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. हितेश मिश्रा के अनुसार मल्टी ड्रग रजिस्टेंट बैक्टीरिया वे होते हैं जो कई दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर लेते हैं यानी उन पर कई एंटीबायोटिक का असर नहीं होता है। पेनिसिलिन, सेफालोस्पोरिन व फ्लूरोक्विनोलोन जैसी दवाएं पहले कारगर थीं, अब कई मामलों में बेअसर हो चुकी हैं।

बिना डाक्टर के परामर्श के एंटीबायोटिक लेना, दवा का पूरा कोर्स नहीं करना और जरूरत नहीं होने पर भी जैसे वायरल सर्दी-जुकाम में सेवन से बैक्टीरिया ताकतवर होता जाता है और बाद में सुपरबग बन जाता है।

इसके अलावा दवा को सही तरीके से नष्ट करने की व्यवस्था नहीं होने, दूध, अंडे या मांस के जरिए जानवरों को दी जाने वाली एंटीबायोटिक के शरीर में पहुंचने से भी धीरे-धीरे इन एंटीबायोटिक का असर खत्म हो जाता है। अगर एंटीबायोटिक के सही इस्तेमाल को लेकर लोग जागरूक नहीं हुए तो आने वाले समय में साधारण संक्रमण भी जानलेवा साबित हो सकते हैं।

नई एंटीबायोटिक कार्बापेनेम भी हुई निष्प्रभावी

आइसीएमआर की 2024 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार पेट की गंभीर समस्याएं, दस्त-यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के कारक ई.कोलाई, फेफड़ों, मूत्र मार्ग और रक्त में संक्रमण करने वाला के. न्यूमोनिया व अस्पतालों खासकर आइसीयू रोगियों में सर्जिकल साइट, फेफड़े या रक्त संक्रमण के कारक ए. बाउमानी जैसे सामान्य जीवाणुओं में कार्बापेनेम व फ्लोरोक्विनोलोन जैसी जरूरी एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध बढ़ रहा है। इससे अस्पताल में होने वाले संक्रमणों के उपचार के विकल्प सीमित हुए हैं। अध्ययन के अनुसार 43 प्रतिशत में पी. एरुगिनोसा व ए. बाउमानी तो 91 प्रतिशत में कार्बापेनेम के प्रति प्रतिरोध क्षमता पाई गई।

के. न्यूमोनिया पाइपेरासिलिन-टाज़ोबैक्टम के प्रति उच्च प्रतिरोध लगभग 75 प्रतिशत में पाया गया। वहीं, पोल्ट्री में इस्तेमाल होने वाले सामान्य एंटीबायोटिक्स में टेट्रासाइक्लिन ग्रुप की डाक्सीसाइक्लिन, आक्सीटेट्रासाइक्लिन, क्विनोलोन ग्रुप की एनरोफ्लोक्सासिन, सिप्रोफ्लोक्सासिन, मैक्रोलाइड्स ग्रुप की एजिथ्रोमाइसिन, टायलोसिन, एमिनोग्लाइकोसाइड्स ग्रुप की नियोमाइसिन, स्ट्रेप्टोमाइसिन, सल्फोनामाइड्स व पेनिसिलिन ग्रुप की एमोक्सिसिलिन आदि निष्प्रभावी हो चुकी हैं।

प्रतिरोधता को कम करने के तरीके

  • एंटीबायोटिक दवाओं का विवेकपूर्ण यानी बिना डाक्टरी परामर्श के नहीं और जितनी दिन कहा जाए उतने दिन का कोर्स पूरा करना। कोर्स पूरा नहीं करने से भी दवाएं निष्प्रभावी हो जाती हैं।
  • सबसे बेहतर है कि संक्रमणों से बचाव करें, इसके लिए टीकाकरण करवाएं और स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं।
  • एंटीबायोटिक समेत सभी दवाओं का उचित निपटान करें, बेहतर होगा कि टेक-बैक नीति दवा दुकानों में शुरू की जाए।
  • एंटीमाइक्रोबियल स्टुअर्डशिप यानी अस्पतालों व क्लीनिकों में एंटीबायोटिक दवाओं के उचित उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए कार्यक्रम लागू करें।
  • स्वच्छता में सुधार: समुदायों में बेहतर स्वच्छता संक्रमण के प्रसार व एंटीबायोटिक दवाओं की मांग को कम करती है।
  • कृषि में उपयोग कम करें: पशुओं में वृद्धि बढ़ाने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग बंद करें और रोग निवारण के लिए उपयोग सीमित करें।
  • विकल्प विकसित करें: फ़ेज, टीके और नवीन उपचारों जैसे, फोटोडायनामिक थेरेपी जैसे नए उपचारों में निवेश करें।
  • निगरानी व शिक्षा: प्रतिरोध की निगरानी करें, जनता व स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को इस मुद्दे के बारे में शिक्षित करें।

यहां-वहां न फेंकें बेकार एंटीबायोटिक, ऐसे करें निस्तारित

बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक दवाओं को निष्प्रभावी करने का एक बड़ा कारण उन्हें यहां-वहां या कचरे में फेंकना भी है। डा. हितेश मिश्रा के अनुसार ये एंटीबायोटिक दो तरह से नुकसान करती हैं। पहला- कचरे में फेंकी दवाएं लंबे समय तक रोगजनक बैक्टीरिया के संपर्क में रहती हैं, इससे उनमें उस दवा की प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। वहीं बहुत सीमित मात्रा में ही सही रिस का भू-गर्म जल और वहां से इंसानी शरीर में पहुंच कर प्रतिरोधक क्षमता विकसित करती है।

शोध बताते हैं कि देश-दुनिया में प्रतिवर्ष एंटीबायोटिक दवाओं का बड़ा हिस्सा नदी-नालों व भूमिगत जल प्रणाली में पहुंच कर प्रतिरोधी सूक्ष्मजीवों या सुपरबग्स तैयार कर रहा है। ऐसे में बची या एक्सपायर दवाओं को मानक के अनुसार नष्ट करना जरूरी है। इसके लिए दवा दुकानदारों को बेकार दवाएं वापस लेने का नियम बनाया जाना चाहिए।

राज्य औषधि नियंत्रक नित्यानंद किसलय ने बताया कि आमजन इन दवाओं को शौचालय में बहा सकते हैं, इससे लंबे समय में वे सेफ्टी टैंक में खुद ही सुरक्षित तरीके से नष्ट हो जाएंगी। वहीं पटना के सहायक औषधि नियंत्रक चुनेंद्र महतो ने कहा कि घर में बेकार रखी दवाएं एक्सपायरी के दो-तीन माह पहले ही नजदीकी सरकारी अस्पताल या नजदीकी दवा दुकान में दान करने से वे या तो किसी के काम आ जाएंगी या फिर उनका सही तरीके से निस्तारण सुनिश्चित हो सकेगा।