एक एनकाउंटर... तीन दलित नेता... अलग-अलग स्टैंड! आखिर बिहार में चल क्या रहा है?
भोजपुर के बिलौटी गांव में भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर अब केवल एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि सत्ता, संवेदना और सामाजिक समीकरणों की राजनीतिक प्रयोगशाला बन ...और पढ़ें

भरत भूषण तिवारी(फाइल फोटो)
HighLights
भोजपुर एनकाउंटर बना बिहार में राजनीतिक बयानबाजी का अखाड़ा।
एनडीए के भीतर जीतन राम मांझी और चिराग पासवान में मतभेद।
अशोक चौधरी ने पीड़ित परिवार से मिलकर संवेदना व्यक्त की।
डिजिटल डेस्क, पटना। बिहार के भोजपुर के बिलौटी गांव में भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर अब केवल एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है। यह घटना सत्ता, संवेदना और सामाजिक समीकरणों की ऐसी राजनीतिक प्रयोगशाला बन चुकी है, जहां हर नेता अपने-अपने तरीके से संदेश देने में जुटा है।
न्यायिक जांच का आदेश हो चुका है, लेकिन उससे पहले राजनीतिक फैसले और बयानबाजी का दौर तेज हो गया है।
संवेदना बनाम सियासत
भरत तिवारी की मौत के बाद सबसे पहले बयान केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का आया, जिन्होंने पुलिस कार्रवाई को सही ठहराया।
इसके ठीक उलट केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान बिलौटी पहुंचे, परिजनों से मिले और पूरे मामले को हत्या बताते हुए पुलिस-प्रशासन पर गंभीर सवाल उठा दिए।
इसके बाद बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी भी गांव पहुंचे और पीड़ित परिवार के साथ खड़े नजर आए। सवाल यह है कि एक ही एनडीए में तीन अलग-अलग आवाजें क्यों सुनाई दे रही हैं?
समीकरणों की नई बिसात
चिराग पासवान का भोजपुर पहुंचना केवल मानवीय संवेदना नहीं माना जा रहा। शाहाबाद क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की उनकी रणनीति पहले से चर्चा में रही है।
ऐसे में भरत तिवारी प्रकरण उन्हें सवर्ण समाज के बीच संवाद का अवसर देता दिख रहा है। वहीं मांझी का रुख उनके पारंपरिक दलित वोट बैंक को संदेश देने वाला माना जा रहा है।
एनडीए के भीतर अलग-अलग सुर
चिराग और मांझी के रिश्तों में लंबे समय से तल्खी रही है। उपचुनाव से लेकर कानून-व्यवस्था तक दोनों कई मुद्दों पर आमने-सामने रहे हैं।
भरत तिवारी प्रकरण ने इस दूरी को फिर सार्वजनिक कर दिया। अशोक चौधरी की एंट्री ने संकेत दिया कि सरकार केवल जांच का भरोसा ही नहीं, बल्कि जनभावना को भी संभालना चाहती है।
क्या नुकसान की भरपाई की कोशिश?
मांझी के बयान के बाद जिस तरह चिराग और फिर अशोक चौधरी बिलौटी पहुंचे, उससे राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि एनडीए संभावित नाराजगी को कम करने की कोशिश कर रहा है।
खासकर उस समय, जब उपचुनाव और आगामी राजनीतिक चुनौतियां सामने हैं। भाजपा की बजाय सहयोगी दलों के नेताओं को आगे करने की रणनीति भी इसी नजरिए से देखी जा रही है।
भरत तिवारी एनकाउंटर की सच्चाई न्यायिक जांच से सामने आएगी, लेकिन उससे पहले राजनीति ने अपना फैसला सुनाना शुरू कर दिया है।
संवेदनाएं भी दिखाई जा रही हैं और सामाजिक समीकरण भी साधे जा रहे हैं। बिलौटी की यह घटना बता रही है कि बिहार में अब हर बड़ी घटना सिर्फ कानून का विषय नहीं रहती, बल्कि चुनावी गणित और राजनीतिक संदेश का माध्यम भी बन जाती है।
अब देखने वाली बात होगी कि जांच की रिपोर्ट ज्यादा असर छोड़ती है या नेताओं की यह सक्रिय राजनीति।
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