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    मिट्टी के घर से पिंक बस की ड्राइविंग सीट तक, बिहार की बेटियों ने रचा इतिहास

    Updated: Fri, 13 Feb 2026 10:43 PM (IST)

    बिहार में महादलित समाज की बेटियां अब पुरानी सोच को बदल रही हैं। गरीबी और सामाजिक बाधाओं को पार कर, ये महिलाएं पिंक बस की ड्राइवर बन इतिहास रच रही हैं। ...और पढ़ें

    पिंक बस चलाएंगी महिलाएं। (जागरण)

    पिंक बस चलाएंगी महिलाएं। (जागरण)

    HighLights

    1. महादलित बेटियां गरीबी और सामाजिक बाधाएं पार कर बनीं ड्राइवर।

    2. बिहार महिला विकास निगम ने दिया हेवी मोटर व्हीकल प्रशिक्षण।

    3. पिंक बस चलाकर समाज में नारी सशक्तिकरण की नई मिसाल।

    सोनाली दुबे, पटना। वर्षों पुरानी सोच अब बदल रही है। जिस समाज ने कभी जाति और गरीबी के नाम पर सीमाएं तय कर दी थीं, आज वही समाज बदलाव को स्वीकार कर रहा है।

    तभी तो महादलित समाज से आने वाली बेटियां अब अपनी सफलता खुद लिख रही हैं। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों से जुड़ी ये महिलाएं, जिनके घरों में पीढ़ियों से मेहनत-मजदूरी ही आजीविका का साधन रही।

    आज गांव की चौखट लांघकर पिंक बस की जिम्मेदारी संभालने जा रही हैं। जिन्हें कभी पिछड़ा माना गया, आज वही महिलाएं बस की सबसे आगे वाली सीट पर बैठकर दर्जनों महिलाओं की सुरक्षा और विश्वास की जिम्मेदारी निभाएंगी। यही परिवर्तन है, यही नारी सशक्तिकरण है।

    इन बेटियों की सफलता के पीछे संघर्ष की एक लंबी दास्तान है। वे उस समाज से आती हैं जहां घर का मतलब होता है—मिट्टी का छोटा-सा कमरा, जिसमें मुश्किल से एक चारपाई आ पाती है।

    Pink Buses DRIVE

    बेबी, सरस्वती और गायत्री।

    उसी चारपाई पर पिता और बेटा सोते हैं, जबकि नीचे जमीन पर चटाई बिछाकर मां और बेटियां रात गुजारती हैं। उसी कमरे के एक कोने में चूल्हा जलता है और वहीं पूरे परिवार का खाना पकता है।

    पिंक बस की महिला चालकों ने बताया कि घर ऐसे ही चलता था। कभी दाल-चावल मिल जाता, तो कभी तंगी के कारण सिर्फ माड़ भात खाकर दिन निकालना पड़ता। कई बार ऐसा भी हुआ कि पिता खुद भूखे सो गए, लेकिन बच्चों को भरपेट खाना जरूर खिलाया।

    भोर से शुरू होती मजदूरी, बचपन से बंट जाती जिम्मेदारी

    इन परिवारों की सुबह सूरज निकलने से पहले शुरू हो जाती है। भोर होते ही पिता और मां खेतों की ओर निकल पड़ते हैं। कभी बोरा उठाने, कभी रोपाई, तो कभी कटनी के काम में। मजदूरी ही जीवन का सहारा है।

    इसी बीच बेटियां स्कूल जाती हैं। स्कूल से लौटते ही वे सीधे खेत पहुंचती हैं,मां-बाप के साथ बोझ उठाने के लिए। यही उनकी दिनचर्या होती है। गरीबी इतनी गहरी कि यहां बचपन की उम्र तय नहीं होती, काम की उम्र तय हो जाती है।

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    पांच साल की उम्र में धान चुनना शुरू होता है। थोड़ा बड़ा होने पर हल्का बोझ उठाया जाता है। फिर धीरे-धीरे बोझ बढ़ता जाता है और उसी के साथ कंधों पर जिम्मेदारियां भी।

    इन बेटियों के मां-बाप ने खुद मजदूरी करते हुए भी उन्होंने बच्चों को स्कूल भेजा। यही वजह है कि इन बेटियों ने पढ़ाई जारी रखी और आगे बढ़ने का सपना देखा। गांव से बाहर जाकर ट्रेनिंग लेना आसान नहीं था।

    ट्रेनिंग से लाइसेंस तक- हौसले की परीक्षा

    महिला विकास निगम के तहत बिहार महादलित विकास मिशन योजना के तहत उन्हें महिला विकास निगम के माध्यम से औरंगाबाद स्थित ड्राइविंग संस्थान में भेजा गया, जहां हेवी मोटर व्हीकल का प्रशिक्षण दिया गया। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आई इन बेटियों के लिए यह सफर आसान नहीं था। भारी वाहन चलाना, तकनीकी जानकारी, टेस्ट और अनुशासन।

    हर कदम पर खुद को साबित करना पड़ा। मेहनत और लगन रंग लाई। ट्रेनिंग पूरी कर उन्होंने लाइसेंस हासिल किया। पहले चरण में छह महिलाएं पिंक बस चलाने के लिए चुनी गई हैं, जिनमें आरती कुमारी, रागिनी कुमारी, अनीता कुमारी, सरस्वती कुमारी, गायत्री कुमारी और बेबी कुमारी शामिल हैं। अत्यंत गरीब परिवारों से निकलकर हेवी मोटर व्हीकल चालक बनीं महिलाएं।

    Pink Buses DRIVER

    अनिता कुमारी। 

    पटना से सटे पुनपुन के अलाउद्दीन गांव की रागिनी बताती हैं कि हमारे समाज में उम्र नहीं, लंबाई और शरीर को ही शादी का पैमाना मान लिया जाता है। जैसे ही लड़की लंबी दिखने लगे यही मान लिया जाता है कि अब उसकी पढ़ाई का कोई मतलब नहीं।

    हर समस्या का एक ही समाधान बताया जाता था—शादी। उनके सामने ही छोटी उम्र की लड़कियों की शादी हो जाती थी, बच्चे हो जाते थे। लेकिन रागिनी ने तय कर लिया था कि वे पहले पढ़ेंगी, अपना करियर बनाएंगी। हालांकि पिता पढ़े-लिखे थे और उन्होंने बेटी का साथ दिया।

    मां खेतों में मजदूरी करती थीं, खुद पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन एक बात साफ कहती थीं, जो काम हम कर रहे हैं, वहीं काम मेरी बेटी न करे। रागिनी जब 26 जनवरी की झांकी में पिंक बस चलाने वाली थीं, तो गांव में खुशी का माहौल था।

    आज वही लोग, जो कभी सवाल उठाते थे, आशीर्वाद देते हैं। गांव के प्रापर्टी डीलर, वार्ड पार्षद और थाना प्रभारी तक उनके घर आकर सम्मान कर चुके हैं। जब वे जीपीओ की तरफ जाती हैं, तो लोग पहचानते हैं—अरे, ये महिला ड्राइवर हैं।

    मिट्टी के घर से पिंक बस की कमान तक

    शिलपालपुर गांव की गलियों में पली-बढ़ी अनिता कुमारी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन वह पटना की सड़कों पर बस चलाएंगी। एक छोटे से कमरे में चारपाई पर पिता और भाई सोते, नीचे चटाई पर मां और बेटी। भोर होते ही माता-पिता खेतों में मजदूरी के लिए निकल जाते।

    Pink Buses DRIVER

    रागिनी।

    अनिता स्कूल जातीं और लौटकर सीधे खेतों में मां-बाप के साथ बोरा उठातीं। पांच साल की उम्र में धान चुनना शुरू किया और उम्र के साथ जिम्मेदारियों का बोझ भी बढ़ता चला गया।

    मायके से मैट्रिक करने के बाद 2021 में, 18 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई। उन्हें लगा कि अब पढ़ाई खत्म। लेकिन यहीं किस्मत ने मोड़ लिया। पति और ससुराल ने पढ़ाई का साथ दिया। 12वीं फर्स्ट डिविजन से पास की और अब ग्रेजुएशन कर रही हैं।

    पैमार घाट की गायत्री का बचपन अत्यधिक गरीबी में बीता। मां-पिता मजदूरी करते थे। पैसों की कमी के कारण पढ़ाई बार-बार रुकती रही, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। फिल्मों या खुशहाल जीवन की झलक उन्हें कभी-कभार बाहर जाकर ही मिलती थी। ऐसे दृश्य देखकर मन में सवाल उठता था कि क्या वे भी कभी ऐसा जीवन जी पाएंगे।

    परिवार और एक मार्गदर्शक दीदी के सहयोग से उसने माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण की, फिर उच्च माध्यमिक और स्नातक में नामांकन कराया। आगे चलकर वाहन चलाने का प्रशिक्षण लिया। शुरू में अवसर नहीं मिला, पर हिम्मत नहीं हारी। 2025 में निकली एक भर्ती के लिए प्रशिक्षण लिया, फिर पिंक बस की रिक्ति के बारे में पता चलने पर आवेदन किया।

    पैमार घाट की सरस्वती भी अपने समाज की पहली लड़की हैं जो इस मुकाम तक पहुंची हैं। उनका मानना है कि हर काम की जानकारी और हुनर हासिल करना जरूरी है। सिर्फ 21 साल की उम्र में उन्होंने अपने परिवार का नाम रोशन किया। उनके पिता कभी स्कूल नहीं जा पाए, मां आठवीं तक पढ़ी हैं, फिर भी दोनों मजदूरी करते हैं।

    शादी के बाद गांव में बातें होने लगीं—“घर की बहू बार-बार बाहर क्यों जाती है? शाम को देर से क्यों लौटती है? लेकिन सरस्वती के पति ने पूरा साथ दिया। वे कहते हैं, “लोगों का काम है बोलना, उन्हें बोलने दो।” परिवार का यह समर्थन ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

    देहरी की बेबी आज भी दोहरी लड़ाई लड़ रही हैं—गरीबी और समाज का दबाव।

    पढ़ाई के प्रति उनका सफर आसान नहीं रहा। पैसों की कमी के कारण उन्हें बीच में दो साल का गैप लेना पड़ा। बताती हैं, पिता ने एक समय पढ़ाई छोड़ने को भी कहा, लेकिन बाद में फिर से हिम्मत जुटाई और 2023 में बीए में एडमिशन लिया। मां कहती हैं कि अगर इस साल कुछ खास नहीं हुआ तो शादी कर देंगी।

    खुद को साबित करने के लिए एक साल का समय है। अब वह एक महिला चालक बनने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं, जहां हर जाति और वर्ग के लोग उनकी बस में बैठेंगे। कहती है, गर्व की बात है कि मैं अपने समाज की पहचान बदल रही हैं और महिला सशक्तिकरण की मिसाल बन रही हैं।