बिहार में ऑनलाइन जुआ खेलने वालों पर होगी कड़ी कार्रवाई, 7 साल की जेल और 10 लाख तक जुर्माने का प्रावधान
बिहार सरकार मानसून सत्र में 'बिहार जुआ (प्रतिषेध) विधेयक, 2026' लाएगी, जिसमें ऑनलाइन जुए और सट्टेबाजी पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है। ...और पढ़ें

बार-बार अपराध करने पर सख्त सजा(AI फोटो)
HighLights
ऑनलाइन जुए पर बिहार सरकार लाएगी नया विधेयक।
पहली बार पकड़े जाने पर 3 साल जेल, 5 लाख जुर्माना।
दोबारा अपराध पर 7 साल जेल, 10 लाख जुर्माना।
राज्य ब्यूरो, पटना। बिहार सरकार राज्य में जुए पर लगाम कसने की तैयारी में है। मानसून सत्र के दौरान सरकार बिहार जुआ (प्रतिषेध) विधेयक, 2026 लाने जा रही है। नए कानून के तहत अब सामान्य जुआघर के साथ-साथ ऑनलाइन जुआ, सट्टेबाजी, उसका संचालन और प्रचार-प्रसार भी अपराध की श्रेणी में आएगा।
बार-बार अपराध करने पर सख्त सजा
विधेयक के अनुसार पहली बार ऑनलाइन जुए में शामिल पाए जाने पर एक से तीन वर्ष तक की जेल और 50 हजार से पांच लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।
वहीं दोबारा इसी अपराध में पकड़े जाने पर अधिकतम सात वर्ष की जेल और एक से दस लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा।
बैंक खाता और वॉलेट देने पर भी होगी कार्रवाई
यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपना बैंक खाता, मोबाइल ऐप, डिजिटल वॉलेट या अन्य डिजिटल खाता जुए के लिए उपलब्ध कराता है या उससे लाभ कमाता है, तो उसे छह माह तक की जेल और 10 हजार रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ेगा। भाग्य के खेल के नाम पर होने वाली ठगी भी इसी कानून के दायरे में आएगी।
विज्ञापन और प्रचार करने वालों पर भी शिकंजा
नए कानून में जुए से जुड़ी सामग्री के प्रकाशन और प्रसारण पर भी कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है।
जुए से संबंधित सूचना के मुद्रण या प्रकाशन पर अधिकतम पांच वर्ष की जेल और पांच लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकेगा। वहीं जुए का विज्ञापन करने पर तीन वर्ष तक की सजा और 50 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।
बिना वारंट होगी तलाशी और गिरफ्तारी
प्रस्तावित विधेयक के अनुसार सार्वजनिक स्थान पर जुए की सूचना मिलने पर पुलिस बिना वारंट तलाशी और गिरफ्तारी कर सकेगी।
कार्रवाई के दौरान बरामद नकदी जब्त की जाएगी तथा बैंक और डिजिटल वॉलेट खाते फ्रीज किए जा सकेंगे।
यदि मोबाइल या कंप्यूटर में जुए या सट्टेबाजी से संबंधित ऐप मिला, तो उसे अपराध का साक्ष्य माना जाएगा। ऐसे मामलों की सुनवाई प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी से नीचे की अदालत में नहीं होगी।